रामचरित मानस खंड-5: दुल्हन की तरह सजी जनकपुरी, हो रहा है सीता-राम विवाह

 


जनकपुरी में सीताजी और रामजी के विवाह की तैयारियां चल रहीं हैं. अयोध्या में भी कम उत्साह नहीं है. फिर भिक्षुकों को बुलाकर करोड़ों प्रकार की निछावरें उनको दीं. 'चक्रवर्ती महाराज दशरथ के चारों पुत्र चिरंजीवी हों. यों कहते हुए वे अनेक प्रकार के सुंदर वस्त्र पहन पहनकर चले. आनंदित होकर नगाड़े वालों ने बड़े जोर से नगाड़ों पर चोट लगाई. सब लोगों ने जब यह समाचार पाया, तब घर-घर बधावे होने लगे. चौदहों लोकों में उत्साह भर गया कि जानकी जी और श्रीरघुनाथजी का विवाह होगा. यह शुभ समाचार पाकर लोग प्रेम-मग्न हो गए और रास्ते, घर तथा गलियां सजाने लगे. यद्यपि अयोध्या सदा सुहावनी है, क्योंकि वह श्रीरामजी की मंगलमयी पवित्र पुरी है, तथापि प्रीति-पर-प्रीति होने से वह सुंदर मंगलरचना से सजाई गई. ध्वजा, पताका, परदे और सुंदर चंवरों से सारा बाजार बहुत ही अनूठा छाया हुआ है. सोने के कलश, तोरण, मणियों की झालरें, हल्दी, दूब, दही, अक्षत और मालाओं से-लोगों ने अपने-अपने घरों को सजाकर मंगलमय बना लिया. गलियों को चतुरसम से सींचा और द्वारों पर सुंदर चौक पुराये. [चन्दन, केशर, कस्तूरी और कपूर से बने हुए एक सुगन्धित द्रव को चतुरसम कहते हैं]. बिजली की-सी कान्तिवाली चन्द्रमुखी, हरिन के बच्चे के-से नेत्रवाली और अपने सुंदर रूप से कामदेव की स्त्री रति के अभिमान को छुड़ाने वाली सुहागिनी स्त्रियां सभी सोलहों श्रृंगार सजकर, जहां-तहां झुंड-की-झुंड मिलकर मनोहर वाणी से मंगलगीत गा रही हैं, जिनके सुंदर स्वर को सुनकर कोयलें भी लजा जाती हैं. राजमहल का वर्णन कैसे किया जाय, जहां विश्व को विमोहित करने वाला मंडप बनाया गया है.

अनेकों प्रकार के मनोहर मांगलिक पदार्थ शोभित हो रहे हैं और बहुत से नगाड़े बज रहे हैं. कहीं भाट विरुदावली (कुलकीर्ति) का उच्चारण कर रहे हैं और कहीं ब्राह्मण वेदध्वनि कर रहे हैं. सुंदरी स्त्रियां श्रीरामजी और श्रीसीताजी का नाम ले-लेकर मंगलगीत गा रही हैं. उत्साह बहुत है और महल अत्यन्त ही छोटा है. इससे उसमें न समाकर मानो वह उत्साह चारों ओर उमड़ चला है. दशरथ के महल की शोभा का वर्णन कौन कवि कर सकता है, जहां समस्त देवताओं के शिरोमणि रामचन्द्रजी ने अवतार लिया है. फिर राजा ने भरतजी को बुला लिया और कहा कि जाकर घोड़े, हाथी और रथ सजाओ, जल्दी रामचन्द्रजी की बारात में चलो. यह सुनते ही दोनों भाई (भरतजी और शत्रुघ्नजी) आनंदवश पुलक से भर गए. भरतजी ने सब साहनी (घुड़साल के अध्यक्ष) बुलाए और उन्हें घोड़ों को सजाने की आज्ञा दी, वे प्रसन्न होकर उठ दौड़े. उन्होंने रुचि के साथ (यथायोग्य) जीनें कसकर घोड़े सजाए. रंग-रंग के उत्तम घोड़े शोभित हो गए. सब घोड़े बड़े ही सुंदर और चंचल चाल के हैं. वे धरती पर ऐसे पैर रखते हैं जैसे जलते हुए लोहे पर रखते हों. अनेकों जाति के घोड़े हैं, जिनका वर्णन नहीं हो सकता. ऐसी तेज चाल के हैं मानो हवा का निरादर करके उड़ना चाहते हैं.

उन सब घोड़ों पर भरतजी के समान अवस्था वाले सब छैल छबीले राजकुमार सवार हुए. वे सभी सुंदर हैं और सब आभूषण धारण किए हुए हैं. उनके हाथों में बाण और धनुष हैं तथा कमर में भारी तरकस बंधे हैं. सभी चुने हुए छबीले छैल, शूरवीर, चतुर और नवयुवक हैं. प्रत्येक सवार के साथ दो पैदल सिपाही हैं, जो तलवार चलाने की कला में बड़े निपुण हैं. शूरता का बाना धारण किए हुए रणधीर वीर सब निकलकर नगर के बाहर आ खड़े हुए. वे चतुर अपने घोड़ों को तरह-तरह की चालों से फेर रहे हैं और भेरी तथा नगाड़े की आवाज सुन-सुनकर प्रसन्न हो रहे हैं. सारथियों ने ध्वजा, पताका, मणि और आभूषणों को लगाकर रथों को बहुत विलक्षण बना दिया है. उनमें सुंदर चंवर लगे हैं और घंटियां सुंदर शब्द कर रही हैं. वे रथ इतने सुंदर हैं मानो सूर्य के रथ की शोभा को छीने लेते हैं.



अगणित श्यामकर्ण घोडे थे. उनको सारथियों ने उन रथों में जोत दिया है, जो सभी देखने में सुंदर और गहनों से सजाए हुए सुशोभित हैं, और जिन्हें देखकर मुनियों के मन भी मोहित हो जाते हैं. जो जलपर भी जमीन की तरह ही चलते हैं. वेग की अधिकता से उनकी टाप पानी में नहीं डूबती. अस्त्र-शस्त्र और सब साज सजाकर सारथियों ने रथियों को बुला लिया. रथों पर चढ़-चढ़कर बारात नगर के बाहर जुटने लगी. जो जिस काम के लिए जाता है, सभी को सुंदर शकुन होते हैं.

श्रेष्ठ हाथियों पर सुंदर अंबारियां पड़ी हैं. वे जिस प्रकार सजाई गई थीं, सो कहा नहीं जा सकता. मतवाले हाथी घंटों से सुशोभित होकर घंटे बजाते हुए चले, मानो सावन के सुंदर बादलों के समूह गरजते हुए जा रहे हों. सुंदर पालकियां, सुख से बैठने योग्य तामजान (जो कुर्सीनुमा होते हैं) और रथ आदि और भी अनेकों प्रकार की सवारियां हैं. उनपर श्रेष्ठ ब्राह्मणों के समूह चढ़कर चले, मानो सब वेदों के छंद ही शरीर धारण किए हुए हों. मागध, सूत, भाट और गुण गाने वाले सब, जो जिस योग्य थे, वैसी सवारी पर चढ़कर चले. बहुत जातियों के खच्चर, ऊंट और बैल असंख्यों प्रकार की वस्तुएं लाद-लादकर चले. कहार करोड़ों कांवरें लेकर चले. उनमें अनेकों प्रकार की इतनी वस्तुएं थीं कि जिनका वर्णन कौन कर सकता है. सब सेवकों के समूह अपना-अपना साज-समाज बनाकर चले. सबके हृदय में अपार हर्ष है और शरीर पुलक से भरे हैं. सबको एक ही लालसा लगी है कि हम श्रीराम-लक्ष्मण दोनों भाइयों को नेत्र भरकर कब देखेंगे. हाथी गरज रहे हैं, उनके घंटों की भीषण ध्वनि हो रही है. चारों ओर रथों की घरघराहट और घोड़ों की हिनहिनाहट हो रही है. बादलों का निरादर करते हुए नगाड़े घोर शब्द कर रहे हैं. किसी को अपनी-परायी कोई बात कानों से सुनायी नहीं देती. राजा दशरथ के दरवाजे पर इतनी भारी भीड़ हो रही है कि वहां पत्थर फेंका जाय तो वह भी पिसकर धूल हो जाय. अटारियों पर चढ़ी स्त्रियां मंगल-थालों में आरती लिए देख रही हैं और नाना प्रकार के मनोहर गीत गा रही हैं. उनके अत्यन्त आनंद का बखान नहीं हो सकता.

तब सुमंतजी ने दो रथ सजाकर उनमें सूर्य के घोड़ों को भी मात करने वाले घोड़े जोते. दोनों सुंदर रथ वे राजा दशरथ के पास ले आए, जिनकी सुंदरता का वर्णन सरस्वती से भी नहीं हो सकता. एक रथपर राजसी सामान सजाया गया और दूसरा जो तेज का पुंज और अत्यन्त ही शोभायमान था, उस सुंदर रथपर राजा वसिष्ठ जी को हर्षपूर्वक चढ़ाकर फिर स्वयं शिव, गुरु, गौरी (पार्वती) और गणेशजी का स्मरण करके दूसरे रथ पर चढ़े. वसिष्ठजी के साथ जाते हुए राजा दशरथजी कैसे शोभित हो रहे हैं, जैसे देवगुरु बृहस्पतिजी के साथ इन्द्र हों. वेद की विधि से और कुल की रीति के अनुसार सब कार्य करके तथा सबको सब प्रकार से सजे देखकर, श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण करके, गुरु की आज्ञा पाकर पृथ्वीपति दशरथजी शंख बजाकर चले. बारात देखकर देवता हर्षित हुए और सुंदर मंगलदायक फूलों की वर्षा करने लगे. बड़ा शोर मच गया, घोड़े और हाथी गरजने लगे. आकाश में और बारात में दोनों जगह बाजे बजने लगे. देवांगनाएं और मनुष्यों की स्त्रियां सुंदर मंगलगान करने लगीं और रसीले राग से शहनाइयां बजने लगीं. घंटे-घंटियों की ध्वनि का वर्णन नहीं हो सकता. पैदल चलने वाले सेवकगण अथवा पट्टेबाज कसरत के खेल कर रहे हैं और फहरा रहे हैं.

सुंदर राजकुमार मृदंग और नगाड़े के शब्द सुनकर घोड़ों को उन्हीं के अनुसार इस प्रकार नचा रहे हैं कि वे ताल के बंधान से जरा भी डिगते नहीं हैं. चतुर नट चकित होकर यह देख रहे हैं. बारात ऐसी बनी है कि उसका वर्णन करते नहीं बनता. सुंदर शुभदायक शकुन हो रहे हैं. नीलकंठ पक्षी बायीं ओर चारा ले रहा है, मानो सम्पूर्ण मंगलों की सूचना दे रहा हो. दाहिनी ओर कौआ सुंदर खेत में शोभा पा रहा है. नेवले का दर्शन भी सब किसी ने पाया. तीनों प्रकार की (शीतल, मन्द, सुगन्धित) हवा अनुकूल दिशा में चल रही है . श्रेष्ठ (सुहागिनी) स्त्रियां भरे हुए घड़े और गोद में बालक लिए आ रही हैं. लोमड़ी फिर-फिरकर दिखायी दे जाती है. गायें सामने खड़ी बछड़ों को दूध पिलाती हैं. हरिनों की टोली बायीं ओर से घूमकर दाहिनी ओर को आई, मानो सभी मंगलों का समूह दिखाई दिया. क्षेमकरी (सफेद सिरवाली चील) विशेष रूप से क्षेम (कल्याण) कह रही है. श्यामा बायीं ओर सुंदर पेड़ पर दिखाई पड़ी. दही, मछली और दो विद्वान ब्राह्मण हाथ में पुस्तक लिए हुए सामने आए. सभी मंगलमय, कल्याणमय और मनोवांछित फल देने वाले शकुन मानो सच्चे होने के लिए एक ही साथ हो गए. स्वयं सगुण ब्रह्म जिसके सुंदर पुत्र हैं, उसके लिए सब मंगल शकुन सुलभ हैं. जहां श्रीरामचन्द्रजी-सरीखे दूल्हा और सीताजी-जैसी दुल्हन हैं तथा दशरथजी और जनकजी जैसे पवित्र समधी हैं.

ऐसा ब्याह सुनकर मानो सभी शकुन नाच उठे और कहने लगे- अब ब्रह्माजी ने हमको सच्चा कर दिया. इस तरह बारात ने प्रस्थान किया. घोड़े, हाथी गरज रहे हैं और नगाड़ों पर चोट लग रही है. सूर्यवंश के पताकास्वरूप दशरथजी को आते हुए जानकर जनकजी ने नदियों पर पुल बंधवा दिए. बीच-बीच में ठहरने के लिए सुंदर घर (पड़ाव) बनवा दिए, जिनमें देवलोक के समान सम्पदा छाई है, और जहां बारात के सब लोग अपने-अपने मन की पसंद के अनुसार सुहावने उत्तम भोजन, बिस्तर और वस्त्र पाते हैं. मन के अनुकूल नित्य नए सुखों को देखकर सभी बरातियों को अपने घर भूल गए. बड़े जोर से बजते हुए नगाड़ों की आवाज सुनकर श्रेष्ठ बारात को आती हुई जानकर अगवानी करने वाले हाथी, रथ, पैदल और घोड़े सजाकर बारात लेने चले. दूध, शर्बत, ठंडाई, जल आदि से भरकर सोने के कलश तथा जिनका वर्णन नहीं हो सकता ऐसे अमृत के समान भांति-भांति के सब पकवानों से भरे हुए परात, थाल आदि अनेक प्रकार के सुंदर बर्तन उत्तम फल तथा और भी अनेकों सुंदर वस्तुएं राजाने हर्षित होकर भेंट के लिए भेजीं. गहने, कपड़े, नाना प्रकार की मूल्यवान मणियां (रत्न), पक्षी, पशु, घोड़े, हाथी और बहुत तरह की सवारियां. तथा बहुत प्रकार के सुगन्धित एवं सुहावने मंगल-द्रव्य और सगुन के पदार्थ राजा ने भेजे. दही, चिउड़ा और अगणित उपहार की चीजें कांवरों में भर-भरकर कहार चले.

अगवानी करने वालों को जब बारात दिखायी दी, तब उनके हृदय में आनंद छा गया और शरीर रोमांच से भर गया. अगवानों को सज-धज के साथ देखकर बारातियों ने प्रसन्न होकर नगाड़े बजाए. कुछ लोग परस्पर मिलने के लिए हर्ष के मारे बाग छोड़कर (सरपट) दौड़ चले, और ऐसे मिले मानो आनंद के दो समुद्र मर्यादा छोड़कर मिलते हों. देवसुंदरियां फूल बरसाकर गीत गा रही हैं, और देवता आनंदित होकर नगाड़े बजा रहे हैं. अगवानी में आए हुए उन

लोगों ने सब चीजें दशरथजी के आगे रख दीं और अत्यन्त प्रेम से विनती की. राजा दशरथजी ने प्रेमसहित सब वस्तुएं ले लीं, फिर उनकी बख्शीशें होने लगीं और वे याचकों को दे दी गईं. तदनंतर पूजा, आदर-सत्कार और बड़ाई करके अगवान लोग उनको जनवासे की ओर लिवा ले चले. विलक्षण वस्त्रों के पांवड़े पड़ रहे हैं, जिन्हें देखकर कुबेर भी अपने धन का अभिमान छोड़ देते हैं. बड़ा सुंदर जनवासा दिया गया, जहां सबको सब प्रकार का सुभीता था. सीताजी ने बारात जनकपुर में आयी जानकर अपनी कुछ महिमा प्रकट करके दिखलायी. हृदय में स्मरण कर सब सिद्धियों को बुलाया और उन्हें राजा दशरथजी की मेहमानी करने के लिए भेजा.

सीताजी की आज्ञा सुनकर सब सिद्धियां जहां जनवासा था वहां सारी सम्पदा, सुख और इन्द्रपुरी के भोग-विलास को लिए हुए गईं. बारातियों ने अपने-अपने ठहरने के स्थान देखे तो वहां देवताओं के सब सुखों को सब प्रकार से सुलभ पाया. इस ऐश्वर्य का कुछ भी भेद कोई जान न सका. सब जनकजी की बड़ाई कर रहे हैं. श्रीरघुनाथजी यह सब सीताजी की महिमा जानकर और उनका प्रेम पहचानकर हृदय में हर्षित हुए. पिता दशरथजी के आने का समाचार सुनकर दोनों भाइयों के हृदय में महान आनंद समाता न था. संकोचवश वे गुरु विश्वामित्रजी से कह नहीं सकते थे; परन्तु मन में पिताजी के दर्शनों की लालसा थी. विश्वामित्रजी ने उनकी बड़ी नम्रता देखी, तो उनके हृदय में बहुत सन्तोष उत्पन्न हुआ. प्रसन्न होकर उन्होंने दोनों भाइयों को हृदय से लगा लिया. उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रों में (प्रेमाश्रुओं का) जल भर आया. वे उस जनवासे को चले, जहां दशरथजी थे. मानो सरोवर प्यासे की ओर लक्ष्य करके चला हो. जब राजा दशरथजी ने पुत्रों सहित मुनि को आते देखा, तब वे हर्षित होकर उठे और सुख के समुद्र में थाह-सी लेते हुए चले. पृथ्वीपति दशरथजी ने मुनि की चरणधूलि को बारंबार सिर पर चढ़ाकर उनको दंडवत प्रणाम किया. विश्वामित्रजी ने राजा को उठाकर हृदय से लगा लिया और आशीर्वाद देकर कुशल पूछी.



फिर दोनों भाइयों को दंडवत प्रणाम करते देखकर राजा के हृदय में सुख समाया नहीं. पुत्रों को उठाकर हृदय से लगाकर उन्होंने अपने वियोगजनित दुख को मिटाया. मानो मृतक शरीर को प्राण मिल गए हों. फिर उन्होंने वसिष्ठजी के चरणों में सिर नवाया. मुनिश्रेष्ठ ने प्रेम के आनंद में उन्हें हृदय से लगा लिया. दोनों भाइयों ने सब ब्राह्मणों की वन्दना की और मनभाये आशीर्वाद पाए. भरतजी ने छोटे भाई शत्रुघ्न सहित श्रीरामचन्द्रजी को प्रणाम किया. श्रीरामजी ने उन्हें उठाकर हृदय से लगा लिया. लक्ष्मणजी दोनों भाइयों को देखकर हर्षित हुए और प्रेम से परिपूर्ण हुए शरीर से उनसे मिले. तदंतर परम कृपालु और विनयी श्रीरामचन्द्रजी अयोध्यावासियों, कुटुम्बियों, जाति के लोगों, याचकों, मन्त्रियों और मित्रों सभी से यथायोग्य मिले. श्रीरामचन्द्रजी को देखकर बारात शीतल हुई. प्रीति की रीति का बखान नहीं हो सकता. राजा के पास चारों पुत्र ऐसी शोभा पा रहे हैं मानो अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष शरीर धारण किए हुए हों. पुत्रों सहित दशरथजी को देखकर नगर के स्त्री-पुरुष बहुत ही प्रसन्न हो रहे हैं. आकाश में देवता फूलों की वर्षा करके नगाड़े बजा रहे हैं और अप्सराएं गा-गाकर नाच रही हैं. अगवानी में आए हुए शतानन्दजी, अन्य ब्राह्मण, मन्त्रीगण, मागध, सूत, विद्वान और भाटों ने बारात सहित राजा दशरथजी का आदर-सत्कार किया. फिर आज्ञा लेकर वे वापस लौटे.

बारात लग्न के दिन से पहले आ गई है, इससे जनकपुर में अधिक आनंद छा रहा है. सब लोग ब्रह्मानन्द प्राप्त कर रहे हैं और विधाता से मनाकर कहते हैं कि दिन-रात बढ़ जाएं. श्रीरामचन्द्रजी और सीताजी सुंदरता की सीमा हैं और दोनों राजा पुण्य की सीमा हैं, जहां-तहां जनकपुरवासी स्त्री-पुरुषों के समूह इकट्ठे हो-होकर यही कह रहे हैं. जनकजी के सुकृत (पुण्य) की मूर्ति जानकीजी हैं और दशरथजी के सुकृत देह धारण किए हुए श्रीरामजी हैं. इन दोनों राजाओं के समान किसी ने शिवजी की आराधना नहीं की; और न इनके समान किसी ने फल ही पाए. इनके समान जगत में न कोई हुआ, न कहीं है, न होने का ही है. हम सब भी सम्पूर्ण पुण्यों की राशि हैं, जो जगत में जन्म लेकर जनकपुर के निवासी हुए और जिन्होंने जानकीजी और श्रीरामचन्द्रजी की छवि देखी है. हमारे सरीखा विशेष पुण्यात्मा कौन होगा! और अब हम श्रीरघुनाथजी का विवाह देखेंगे और भलीभांति नेत्रों का लाभ लेंगे.

कोयल के समान मधुर बोलने वाली स्त्रियां आपस में कहती हैं कि हे सुंदर नेत्रोंवाली ! इस विवाह में बड़ा लाभ है. बड़े भाग्य से विधाता ने सब बात बना दी है, ये दोनों भाई हमारे नेत्रों के अतिथि हुआ करेंगे. जनकजी स्नेहवश बार-बार सीताजी को बुलावेंगे, और करोड़ों कामदेवों के समान सुंदर दोनों भाई सीताजी को लेने (विदा कराने) आया करेंगे. तब उनकी अनेकों प्रकार से पहुनाई होगी. सखी! ऐसी ससुराल किसे प्यारी न होगी! तब- तब हम सब नगरनिवासी श्रीराम-लक्ष्मण को देख-देखकर सुखी होंगे. हे सखी! जैसा श्रीराम-लक्ष्मण का जोड़ा है, वैसे ही दो कुमार राजा के साथ और भी हैं. वे भी एक श्याम और दूसरे गौर वर्ण के हैं. उनके भी सब अंग बहुत सुंदर हैं. जो लोग उन्हें देख आए हैं, वे सब यही कहते हैं. एक ने कहा- मैंने आज ही उन्हें देखा है; इतने सुंदर हैं, मानो ब्रह्माजी ने उन्हें अपने हाथों संवारा है. भरत तो श्रीरामचन्द्रजी की ही शक्ल-सूरत के हैं. स्त्री-पुरुष उन्हें सहसा पहचान नहीं सकते. लक्ष्मण और शत्रुघ्न दोनों का एक रूप है. दोनों के नख से शिखा तक सभी अंग अनुपम हैं. मन को बड़े अच्छे लगते हैं, पर मुख से उनका वर्णन नहीं हो सकता. उनकी उपमा के योग्य तीनों लोकों में कोई नहीं है. जनकपुर की सब स्त्रियां आंचल फैलाकर विधाता को यह विनती सुनाती हैं कि चारों भाइयों का विवाह इसी नगर में हो और हम सब सुंदर मंगल गावें. जल भरकर पुलकित शरीर से स्त्रियां आपस में कह रही हैं कि हे सखी! दोनों राजा पुण्य के समुद्र हैं, त्रिपुरारि शिवजी सब मनोरथ पूर्ण करेंगे.

इस प्रकार सब मनोरथ कर रही हैं और हृदय को उमंग-उमंगकर आनंद से भर रही हैं. सीताजी के स्वयंवर में जो राजा आए थे, उन्होंने भी चारों भाइयों को देखकर सुख पाया. श्रीरामचन्द्रजी का निर्मल और महान यश कहते हुए राजा लोग अपने-अपने घर गए. इस प्रकार कुछ दिन बीत गए. जनकपुर निवासी और बराती सभी बड़े आनन्दित हैं. मंगलों का मूल लग्न का दिन आ गया. हेमन्त ऋतु और सुहावना अगहन का महीना था. ग्रह, तिथि, नक्षत्र, योग और वार श्रेष्ठ थे. लग्न (मुहूर्त) शोधकर ब्रह्माजी ने उसपर विचार किया और उस (लग्नपत्रिका) को नारदजी के हाथ जनकजी के यहां भेज दिया. जनकजी के ज्योतिषियों ने भी वही गणना कर रखी थी. जब सब लोगों ने यह बात सुनी तब वे कहने लगे- यहां के ज्योतिषी भी ब्रह्मा ही हैं. निर्मल और सभी सुंदर मंगलों की मूल गोधूलि की पवित्र वेला आ गई और अनुकूल शकुन होने लगे, यह जानकर ब्राह्मणों ने जनकजी से कहा. तब राजा जनक ने पुरोहित शतानन्दजी से कहा कि अब देर का क्या कारण है. तब शतानन्दजी ने मन्त्रियों को बुलाया. वे सब मंगल का सामान सजाकर ले आए. शंख, नगाड़े, ढोल और बहुत-से बाजे बजने लगे तथा मंगल-कलश और शुभ शकुन की वस्तुएं (दधि, दूर्वा आदि) सजाई गईं. सुंदर सुहागिन स्त्रियां गीत गा रही हैं और पवित्र ब्राह्मण वेद की ध्वनि कर रहे हैं.



सब लोग इस प्रकार आदरपूर्वक बारात को लेने चले और जहां बारातियों का जनवासा था, वहां गए. अवधपति दशरथजी का समाज (वैभव) देखकर उनको देवराज इन्द्र भी बहुत ही तुच्छ लगने लगे. उन्होंने जाकर विनती की- समय हो गया, अब पधारिये. यह सुनते ही नगाड़ों पर चोट पड़ी. गुरु वसिष्ठजी से पूछकर और कुल की सब रीतियों को करके राजा दशरथजी मुनियों और साधुओं के समाज को साथ लेकर चले. अवधनरेश दशरथजी का भाग्य और वैभव देखकर और अपना जन्म व्यर्थ समझकर, ब्रह्माजी आदि देवता हजारों मुखों से उसकी सराहना करने लगे. देवगण सुंदर मंगल का अवसर जानकर, नगाड़े बजा-बजाकर फूल बरसाते हैं. शिवजी, ब्रह्माजी आदि देववृन्द टोलियां बना-बनाकर विमानों पर जा चढ़े और प्रेम से पुलकित-शरीर हो तथा हृदय में उत्साह भरकर श्रीरामचन्द्रजी का विवाह देखने चले. जनकपुर को देखकर देवता इतने अनुरक्त हो गए कि उन सबको अपने-अपने लोक बहुत तुच्छ लगने लगे. विचित्र मंडप को तथा नाना प्रकार की सब अलौकिक रचनाओं को वे चकित होकर देख रहे हैं. नगर के स्त्री-पुरुष रूप के भंडार सुघड़, श्रेष्ठ धर्मात्मा, सुशील और सुजान हैं. उन्हें देखकर सब देवता और देवांगनाएं ऐसे प्रभाहीन हो गए जैसे चन्द्रमा के उजियाले में तारागण फीके पड़ जाते हैं. ब्रह्माजीको विशेष आश्चर्य हुआ; क्योंकि वहां उन्होंने अपनी कोई रचना तो कहीं देखी ही नहीं.

तब शिवजी ने सब देवताओं को समझाया कि तुम लोग आश्चर्य में मत भूलो. हृदय में धीरज धरकर विचार तो करो कि यह श्रीसीताजी का और श्रीरामचन्द्रजी का विवाह है, जिनका नाम लेते ही जगत में सारे अमंगलों की जड़ कट जाती है और चारों पदार्थ (अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष) मुट्ठी में आ जाते हैं, ये वही श्रीसीतारामजी हैं; काम के शत्रु शिवजी ने ऐसा कहा. इस प्रकार शिवजी ने देवताओं को समझाया और फिर अपने श्रेष्ठ बैल नन्दीश्वर को आगे बढ़ाया. देवताओं ने देखा कि दशरथजी मन में बड़े ही प्रसन्न और शरीर से पुलकित हुए चले जा रहे हैं. उनके साथ परम हर्षयुक्त साधुओं और ब्राह्मणों की मंडली ऐसी शोभा दे रही है, मानो समस्त सुख शरीर धारण करके उनकी सेवा कर रहे हों. चारों सुंदर पुत्र साथ में ऐसे सुशोभित हैं, मानो सम्पूर्ण मोक्ष (सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सायुज्य) शरीर धारण किए हुए हों. मरकतमणि और सुवर्ण के रंग की सुंदर जोड़ियों को देखकर देवताओं को कम प्रीति नहीं हुई (अर्थात् बहुत ही प्रीति हुई). फिर श्रीरामचन्द्रजी को देखकर वे हृदय में अत्यन्त हर्षित हुए और राजा की सराहना करके उन्होंने फूल बरसाए. नख से शिखा तक श्रीरामचन्द्रजी के सुंदर रूप को बार-बार देखते हुए पार्वतीजी सहित श्रीशिवजी का शरीर पुलकित हो गया और उनके नेत्र प्रेमाश्रुओं के जल से भर गए. रामजी का मोर के कंठ की-सी कान्तिवाला श्याम शरीर है. बिजली का अत्यन्त निरादर करने वाले प्रकाशमय सुंदर पीत रंग के वस्त्र हैं. सब मंगलरूप और सब प्रकार से सुंदर भांति-भांति के विवाह के आभूषण शरीर पर सजाये हुए हैं.







उनका सुंदर मुख शरद पूर्णिमा के निर्मल चन्द्रमा के समान और मनोहर नेत्र नवीन कमल को लजाने वाले हैं. सारी सुंदरता अलौकिक है. वह कही नहीं जा सकती, मन-ही-मन बहुत प्रिय लगती है. साथ में मनोहर भाई शोभित हैं, जो चंचल घोड़ों को नचाते हुए चले जा रहे हैं. राजकुमार श्रेष्ठ घोड़ों को दिखला रहे हैं और वंश की प्रशंसा करने वाले (मागध-भाट) विरुदावली सुना रहे हैं. जिस घोड़े पर श्रीरामजी विराजमान हैं, उसकी तेज चाल देखकर गरुड़ भी लजा जाते हैं. उसका वर्णन नहीं हो सकता, वह सब प्रकार से सुंदर है. मानो कामदेव ने ही घोड़े का वेष धारण कर लिया हो. मानो श्रीरामचन्द्रजी के लिए कामदेव घोड़े का वेष बनाकर अत्यन्त शोभित हो रहा है. वह अपनी अवस्था, बल, रूप, गुण और चाल से समस्त लोकों को मोहित कर रहा है. सुंदर मोती, मणि और माणिक्य लगी हुई जड़ाऊ जीन ज्योति से जगमगा रहा है. उसकी सुंदर घुंघरू लगी ललित लगाम को देखकर देवता, मनुष्य और मुनि सभी ठगे जाते हैं. प्रभु की इच्छा में अपने मन को लीन किए चलता हुआ वह घोड़ा बड़ी शोभा पा रहा है. मानो तारागण तथा बिजली से अलंकृत मेघ सुंदर मोर को नचा रहा हो. जिस श्रेष्ठ घोड़े पर श्रीरामचन्द्रजी सवार हैं, उसका वर्णन सरस्वतीजी भी नहीं कर सकतीं. शंकरजी श्रीरामचन्द्रजी के रूप में ऐसे अनुरक्त हुए कि उन्हें अपने पंद्रह नेत्र इस समय बहुत ही प्यारे लगने लगे.

भगवान विष्णु ने जब प्रेमसहित श्रीराम को देखा, तब वे रमणीयता की मूर्ति श्रीलक्ष्मीजी के पति श्रीलक्ष्मीजी सहित मोहित हो गए. श्रीरामचन्द्रजी की शोभा देखकर ब्रह्माजी बड़े प्रसन्न हुए, पर अपने आठ ही नेत्र जानकर पछताने लगे. देवताओं के सेनापति स्वामिकार्तिक के हृदय में बड़ा उत्साह है, क्योंकि वे ब्रह्माजी से ड्योढ़े अर्थात् बारह नेत्रों से रामदर्शन का सुंदर लाभ उठा रहे हैं. सुजान इन्द्र अपने हजार नेत्रों से श्रीरामचन्द्रजी को देख रहे हैं और गौतमजी के शापको अपने लिए परम हितकर मान रहे हैं. सभी देवता देवराज इन्द्र से ईर्ष्या कर रहे हैं और कह रहे हैं कि आज इन्द्र के समान भाग्यवान दूसरा कोई नहीं है. श्रीरामचन्द्रजीको देखकर देवगण प्रसन्न हैं और दोनों राजाओं के समाज में विशेष हर्ष छा रहा है. दोनों ओर से राजसमाज में अत्यन्त हर्ष है और बड़े जोर से नगाड़े बज रहे हैं. देवता प्रसन्न होकर और ‘रघुकुलमणि श्रीरामकी जय हो, जय हो, जय हो' कहकर फूल बरसा रहे हैं. इस प्रकार बारात को आती हुई जानकर बहुत प्रकार के बाजे बजने लगे और रानी सुहागिन स्त्रियों को बुलाकर परछन के लिए मंगलद्रव्य सजाने लगीं. अनेक प्रकार से आरती सजकर और समस्त मंगद्रव्यों को यथायोग्य सजाकर गजगामिनी (हाथी की-सी चालवाली) उत्तम स्त्रियां आनंदपूर्वक परछन के लिए चलीं. सभी स्त्रियां चन्द्रमुखी (चन्द्रमा के समान मुखवाली) और सभी मृगलोचनी (हिरण की-सी आंखों वाली) हैं और सभी अपने शरीर की शोभा से रति के गर्व को छुड़ाने वाली हैं. रंग-रंग की सुंदर साड़ियां पहने हैं और शरीर पर सब आभूषण सजे हुए हैं.

समस्त अंगों को सुंदर मंगल पदार्थों से सजाये हुए वे कोयल को भी लजाती हुई मधुर स्वर से गान कर रही हैं. कंगन, करधनी और नूपुर बज रहे हैं. स्त्रियों की चाल देखकर कामदेव के हाथी भी लजा जाते हैं. अनेक प्रकार के बाजे बज रहे हैं, आकाश और नगर दोनों स्थानों में सुंदर मंगलाचार हो रहे हैं. शची (इन्द्राणी), सरस्वती, लक्ष्मी, पार्वती और जो स्वभाव से ही पवित्र और सयानी देवांगनाएं थीं, वे सब कपट से सुंदर स्त्री का वेष बनाकर रनिवास में जा मिलीं और मनोहर वाणी से मंगलगान करने लगीं. सब कोई हर्ष के विशेष वश थे, अतःकिसी ने उन्हें पहचाना नहीं. कौन किसे जाने-पहिचाने! आनंद के वश हुई सब दूल्हे बने हुए ब्रह्म का परछन करने चलीं. मनोहर गान हो रहा है. मधुर मधुर नगाड़े बज रहे हैं, देवता फूल बरसा रहे हैं, बड़ी अच्छी शोभा है. आनंदकन्द दूल्हे को देखकर सब स्त्रियां हृदय में हर्षित हुईं. उनके कमल-सरीखे नेत्रों में प्रेमाश्रुओं का जल उमड़ आया और सुंदर अंगों में पुलकावली

छा गई. श्रीरामचन्द्रजी का वरवेष देखकर सीताजी की माता सुनयनाजी के मन में जो सुख हुआ, उसे हजारों सरस्वती और शेषजी सौ कल्पों में भी नहीं कह सकते (अथवा लाखों सरस्वती और शेष लाखों कल्पोंमें भी नहीं कह सकते). मंगल अवर जानकर नेत्रों के जल को रोके हुए रानी प्रसन्न मन से परछन कर रही हैं. वेदों में कहे हुए तथा कुलाचार के अनुसार सभी व्यवहार रानी ने भलीभांति किये.

पंचशब्द (तन्त्री, ताल, झांझ, नगारा और तुरही), पंचध्वनि (वेदध्वनि, वन्दिध्वनि, जयध्वनि, शंखध्वनि और हुलूध्वनि) और मंगलगान हो रहे हैं. नाना प्रकार के वस्त्रों के पांवड़े पड़ रहे हैं. उन्होंने (रानी ने) आरती करके अर्घ्य दिया, तब श्रीरामजी ने मंडप में गमन किया. दशरथजी अपनी मंडली सहित विराजमान हुए. उनके वैभव को देखकर लोकपाल भी लजा गए. समय-समय पर देवता फूल बरसाते हैं और भूदेव ब्राह्मण समयानुकूल शान्ति पाठ करते हैं. आकाश और नगर में शोर मच रहा है. अपनी-परायी कोई कुछ भी नहीं सुनता. इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी मंडप में आए और अर्घ्य देकर आसन पर बैठाए गए. आसन पर बैठाकर, आरती करके दूल्हे को देखकर स्त्रियां सुख पा रही हैं. वे ढेर-के-ढेर मणि, वस्त्र और गहने निछावर करके मंगल गा रही हैं. ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ देवता ब्राह्मण का वेष बनाकर कौतुक देख रहे हैं. वे रघुकुलरूपी कमल के प्रफुल्लित करने वाले सूर्य श्रीरामचन्द्रजी की छवि देखकर अपना जीवन सफल जान रहे हैं. नाई, बारी, भाट और नट श्रीरामचन्द्रजी की निछावर पाकर आनन्दित हो सिर नवाकर आशीष देते हैं; उनके हृदय में हर्ष समाता नहीं है. वैदिक और लौकिक सब रीतियां करके जनकजी और दशरथजी बडे प्रेम से मिले. दोनों महाराज मिलते हुए बड़े ही शोभित हुए, कवि उनके लिए उपमा खोज-खोजकर लजा गए.

जब कहीं भी उपमा नहीं मिली, तब हृदय में हार मानकर उन्होंने मन में यही उपमा निश्चित की कि इनके समान ये ही हैं. समधियों का मिलाप या परस्पर सम्बन्ध देखकर देवता अनुरक्त हो गए और फूल बरसाकर उनका यश गाने लगे. वे कहने लगे- जब से ब्रह्माजी ने जगत को उत्पन्न किया, तबसे हमने बहुत विवाह देखे- सुने; परन्तु सब प्रकार से समान साज-समाज और बराबरी के समधी तो आज ही देखे. देवताओं की सुंदर सत्यवाणी सुनकर दोनों ओर अलौकिक प्रीति छा गई. सुंदर पांवड़े और अर्घ्य देते हुए जनकजी दशरथजी को आदरपूर्वक मंडप में ले आए. मंडप को देखकर उसकी विचित्र रचना और सुंदरता से मुनियों के मन भी हरे गए. सुजान जनकजी ने अपने हाथों से ला-लाकर सबके लिए सिंहासन रखे. उन्होंने अपने कुल के इष्टदेवता के समान वसिष्ठजी की पूजा की और विनय करके आशीर्वाद प्राप्त किया. विश्वामित्रजी की पूजा करते समय की परम प्रीति की रीति तो कहते ही नहीं बनती. राजा ने वामदेव आदि ऋषियों की प्रसन्न मन से पूजा की. सभी को दिव्य आसन दिये और सबसे आशीर्वाद प्राप्त किया. फिर उन्होंने कोसलाधीश राजा दशरथजी की पूजा उन्हें ईश (महादेवजी) के समान जानकर की, कोई दूसरा भाव न था. तदनन्तर अपने भाग्य और वैभव के विस्तार की सराहना करके हाथ जोड़कर विनती और बड़ाई की. राजा जनकजी ने सब बारातियों का समधी दशरथजी के समान ही सब प्रकार से आदरपूर्वक पूजन किया और सब किसी को उचित आसन दिए. मैं एक मुख से उस उत्साह का क्या वर्णन करूं.

राजा जनक ने दान, मान-सम्मान, विनय और उत्तम वाणी से सारी बारात का सम्मान किया. ब्रह्मा, विष्णु शिव, दिक्पाल और सूर्य जो श्रीरघुनाथजी का प्रभाव जानते हैं, वे कपट से ब्राह्मणों का सुंदर वेष बनाये बहुत ही सुख पाते हुए सब लीला देख रहे थे. जनकजी ने उनको देवताओं के समान जानकर उनका पूजन किया और बिना पहचाने भी उन्हें सुंदर आसन दिये. कौन किसको जाने-पहिचाने! सबको अपनी ही सुध भूली हुई है. आनंदकन्द दूल्हे को देखकर दोनों ओर आनंदमयी स्थिति हो रही है. सुजान (सर्वज्ञ) श्रीरामचन्द्रजी ने देवताओं को पहचान लिया और उनकी मानसिक पूजा करके उन्हें मानसिक आसन दिये. प्रभु का शील-स्वभाव देखकर देवगण मन में बहुत आनन्दित हुए. श्रीरामचन्द्रजी के मुखरूपी चन्द्रमा की छवि को सभी के सुंदर नेत्ररूपी चकोर आदरपूर्वक पान कर रहे हैं; प्रेम और आनंद कम नहीं है. समय देखकर वसिष्ठजी ने शतानन्दजी को आदरपूर्वक बुलाया. वे सुनकर आदर के साथ आए. वसिष्ठजी ने कहा- अब जाकर राजकुमारी को शीघ्र ले आइये. मुनि की आज्ञा पाकर वे प्रसन्न होकर चले. बुद्धिमती रानी पुरोहित की वाणी सुनकर सखियों समेत बड़ी प्रसन्न हुईं. ब्राह्मणों की स्त्रियों और कुल की बूढ़ी स्त्रियों को बुलाकर उन्होंने कुलरीति करके सुंदर मंगलगीत गाए.

श्रेष्ठ देवांगनाएं जो सुंदर मनुष्य-स्त्रियों के वेष में हैं, सभी स्वभाव से ही सुन्दरी और श्यामा (सोलह वर्ष की अवस्था वाली) हैं. उनको देखकर रनिवास की स्त्रियां सुख पाती हैं और बिना पहचान के ही वे सबको प्राणों से भी प्यारी हो रही हैं. उन्हें पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती के समान जानकर रानी बार-बार उनका सम्मान करती हैं. रनिवास की स्त्रियां और सखियां सीताजी का श्रृंगार करके, मंडली बनाकर, प्रसन्न होकर उन्हें मंडप में लिवा चलीं. सुंदर मंगल का साज सजकर [रनिवास की] स्त्रियां और सखियां आदरसहित सीताजी को लिवा चलीं. सभी सुन्दरियां सोलहों शृंगार किए हुए मतवाले हाथियों की चाल से चलने वाली हैं. उनके मनोहर गान को सुनकर मुनि ध्यान छोड़ देते हैं और कामदेव की कोयलें भी लजा जाती हैं. पायजेब, पैंजनी और सुंदर कंकण ताल की गतिपर बड़े सुंदर बज रहे हैं. सहज ही सुन्दरी सीताजी स्त्रियों के समूह में इस प्रकार शोभा पा रही हैं, मानो छवि रूपी ललनाओं के समूह के बीच साक्षात परम मनोहर शोभारूपी स्त्री सुशोभित हो. सीताजी की सुंदरता का वर्णन नहीं हो सकता, क्योंकि बुद्धि बहुत छोटी है और मनोहरता बहुत बड़ी है. रूप की राशि और सब प्रकार से पवित्र सीताजी को बारातियों ने आते देखा. सभी ने उन्हें मन-ही-मन प्रणाम किया. श्रीरामचन्द्रजी को देखकर तो सभी पूर्णकाम (कृतकृत्य) हो गए. राजा दशरथजी पुत्रों सहित हर्षित हुए. उनके हृदय में जितना आनंद था, वह कहा नहीं जा सकता.

देवता प्रणाम करके फूल बरसा रहे हैं. मंगलों की मूल मुनियों के आशीर्वादों की ध्वनि हो रही है. गानों और नगाड़ों के शब्द से बड़ा शोर मच रहा है. सभी नर-नारी प्रेम और आनंद में मग्न हैं. इस प्रकार सीताजी मंडप में आईं. मुनिराज बहुत ही आनन्दित होकर शान्तिपाठ पढ़ रहे हैं. उस अवसर की सब रीति, व्यवहार और कुलाचार दोनों कुलगुरुओं ने किए. कुलाचार करके गुरुजी प्रसन्न होकर गौरीजी, गणेशजी और ब्राह्मणों की पूजा करा रहे हैं [अथवा ब्राह्मणों के द्वारा गौरी और गणेश की पूजा करवा रहे हैं]. देवता प्रकट होकर पूजा ग्रहण करते हैं, आशीर्वाद देते हैं और अत्यन्त सुख पा रहे हैं. स्वयं सूर्यदेव प्रेमसहित अपने कुल की सब रीतियां बता देते हैं और वे सब आदरपूर्वक की जा रही हैं. इस प्रकार देवताओं की पूजा कराके मुनियों ने सीताजी को सुंदर सिंहासन दिया. श्रीसीताजी और

श्रीरामजी का आपस में एक-दूसरे को देखना तथा उनका परस्पर का प्रेम किसी को लख नहीं पड़ रहा है. जो बात श्रेष्ठ मन, बुद्धि और वाणी से भी परे है, उसे कवि क्यों प्रकट करें? हवन के समय अग्निदेव शरीर धारण करके बड़े ही सुख से आहुति ग्रहण करते हैं और सारे वेद ब्राह्मण का वेष धरकर विवाह की विधियां बताए देते हैं. जनकजी की जगद्विख्यात पटरानी और सीताजी की माता का बखान तो हो ही कैसे सकता है. सुयश, सुकृत (पुण्य), सुख और सुंदरता सबको बटोरकर विधाता ने उन्हें संवारकर तैयार किया है.

समय जानकर श्रेष्ठ मुनियों ने उनको बुलवाया. यह सुनते ही सुहागिनी स्त्रियां उन्हें आदरपूर्वक ले आईं. सुनयनाजी (जनकजी की पटरानी) जनकजी की बायीं ओर ऐसी सोह रही हैं, मानो हिमाचल के साथ मैनाजी शोभित हों. पवित्र, सुगन्धित और मंगल जल से भरे सोने के कलश और मणियों की सुंदर परातें राजा और रानी ने आनन्दित होकर अपने हाथों से लाकर श्रीरामचन्द्रजी के आगे रखीं. मुनि मंगलवाणी से वेद पढ़ रहे हैं. सुअवसर जानकर आकाश से फूलों की झड़ी लग गई. दूल्हे को देखकर राजा-रानी प्रेममग्न हो गए और उनके पवित्र चरणों को पखारने लगे. वे श्रीरामजी के चरणकमलों को पखारने लगे, प्रेम से उनके शरीर में पुलकावली छा रही है. आकाश और नगर में होने वाली गान, नगाड़े और जय-जयकार की ध्वनि मानो चारों दिशाओं में उमड़ चली. जो चरणकमल कामदेव के शत्रु श्रीशिवजी के हृदयरूपी सरोवर में सदा ही विराजते हैं, जिनका एक बार भी स्मरण करने से मन में निर्मलता आ जाती है और कलियुग के सारे पाप भाग जाते हैं, जिनका स्पर्श पाकर गौतम मुनि की स्त्री अहल्या ने, जो पापमयी थी, परमगति पायी, जिन चरणकमलों का मकरन्दरस (गंगाजी) शिवजी के मस्तक पर विराजमान है, जिसको देवता पवित्रता की सीमा बताते हैं; मुनि और योगीजन अपने मन को भौंरा बनाकर जिन चरणकमलों का सेवन करके मनोवांछित गति प्राप्त करते हैं; उन्हीं चरणों को भाग्य के पात्र (बड़भागी) जनकजी धो रहे हैं; यह देखकर सब जय-जयकार कर रहे हैं.

दोनों कुलों के गुरु वर और कन्या की हथेलियों को मिलाकर शंखोच्चार करने लगे. पाणिग्रहण हुआ देखकर ब्रह्मादि देवता, मनुष्य और मुनि आनंद में भर गए. सुख के मूल दूल्हे को देखकर राजा-रानी का शरीर पुलकित हो गया और हृदय आनंद से उमंग उठा. राजाओं के अलंकारस्वरूप महाराज जनकजी ने लोक और वेद की रीति को करके कन्यादान किया. जैसे हिमवान ने शिवजी को पार्वतीजी और सागर ने भगवान् विष्णु को लक्ष्मीजी दी थीं, वैसे ही जनकजी ने श्रीरामचन्द्रजी को सीताजी समर्पित कीं, जिससे विश्व में सुंदर नवीन कीर्ति छा गई. विदेह (जनकजी) कैसे विनती करें! उस सांवली मूर्ति ने तो उन्हें सचमुच विदेह (देह की सुध-बुध से रहित) ही कर दिया. विधिपूर्वक हवन करके गठजोड़ी की गई और भांवरें होने लगीं. वर और कन्या सुंदर भांवरें दे रहे हैं. सब लोग आदरपूर्वक नेत्रों का परम लाभ ले रहे हैं. मनोहर जोड़ी का वर्णन नहीं हो सकता, जो कुछ उपमा कहूं वही थोड़ी होगी. श्रीरामजी और श्रीसीताजी की सुंदर परछाहीं मणियों के खम्भों में जगमगा रही हैं, मानो कामदेव और रति बहुत-से रूप धारण करके श्रीरामजी के अनुपम विवाह को देख रहे हैं.

उन्हें (कामदेव और रति को) दर्शन की लालसा और संकोच दोनों ही कम नहीं हैं; इसीलिए वे मानो बार-बार प्रकट होते और छिपते हैं. सब देखने वाले आनंदमग्न हो गए और जनकजी की भांति सभी अपनी सुध भूल गए. मुनियों ने आनंदपूर्वक भांवरें फिरायीं और नेग सहित सब रीतियों को पूरा किया. श्रीरामचन्द्रजी सीताजी के सिर में सिंदूर दे रहे हैं; यह शोभा किसी प्रकार भी कही नहीं जाती, मानो कमल को लाल पराग से अच्छी तरह भरकर अमृत के लोभ से सांप चन्द्रमा को भूषित कर रहा है. फिर वसिष्ठजी ने आज्ञा दी, तब दूल्हा और दुल्हन एक आसन पर बैठे. श्रीरामजी और जानकीजी श्रेष्ठ आसन पर बैठे; उन्हें देखकर दशरथजी मन में बहुत आनन्दित हुए. अपने सुकृतरूपी कल्पवृक्ष में नए फल देखकर उनका शरीर बार-बार पुलकित हो रहा है. चौदहों भुवनों में उत्साह भर गया; सबने कहा कि श्रीरामचन्द्रजी का विवाह हो गया. जीभ एक है और यह मंगल महान है; फिर भला, वह वर्णन करके किस प्रकार समाप्त किया जा सकता है! तब वसिष्ठजी की आज्ञा पाकर जनकजी ने विवाह का सामान सजाकर मांडवीजी श्रुतकीर्तिजी और उर्मिलाजी इन तीनों राजकुमारियों को बुला लिया. कुशध्वज की बड़ी कन्या मांडवीजी को जो गुण, शील, सुख और शोभा की रूप ही थीं, राजा जनक ने प्रेमपूर्वक सब रीतियां करके भरतजी को ब्याह दिया.

जानकीजी की छोटी बहिन उर्मिलाजी को सब सुन्दरियों में शिरोमणि जानकर उस कन्या को सब प्रकार से सम्मान करके, लक्ष्मणजी को ब्याह दिया; और जिनका नाम श्रुतकीर्ति है और जो सुंदर नेत्रों वाली, सुंदर मुखवाली, सब गुणों की खान और रूप तथा शील में उजागर हैं, उनको राजा ने शत्रुघ्न को ब्याह दिया. दूल्हे और दुल्हनें परस्पर अपनी-अपनी अनुरूप जोड़ी को देखकर सकुचते हुए हृदय में हर्षित हो रही हैं. सब लोग प्रसन्न होकर उनकी सुंदरता की सराहना करते हैं और देवगण फूल बरसा रहे हैं. सब सुन्दरी दुल्हनें सुंदर दूल्हों के साथ एक ही मंडप में ऐसी शोभा पा रही हैं, मानो जीव के हृदय में चारों अवस्थाएं (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय) अपने चारों स्वामियों (विश्व, तेजस, प्राज्ञ और ब्रह्म) सहित विराजमान हों. सब पुत्रों को बहुओं सहित देखकर अवधनरेश दशरथजी ऐसे आनन्दित हैं, मानो वे राजाओं के शिरोमणि क्रियाओं (यज्ञक्रिया, श्रद्धाक्रिया, योगक्रिया और ज्ञानक्रिया) सहित चारों फल (अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष) पा गए हों. श्रीरामचन्द्रजी के विवाह की जैसी विधि वर्णन की गई, उसी रीति से सब राजकुमार विवाहे गए. दहेज की अधिकता कुछ कही नहीं जाती; सारा मंडप सोने और मणियों से भर गया. बहुत से कम्बल, वस्त्र और भांति-भांति के विचित्र रेशमी कपड़े, जो थोड़ी कीमत के न थे (अर्थात् बहुमूल्य थे) तथा हाथी, रथ, घोड़े, दास-दासियां और गहनों से सजी हुई कामधेनु- सरीखी गाएं अनेकों वस्तुएं हैं, जिनकी गिनती कैसे की जाय. उनका वर्णन नहीं किया जा सकता, जिन्होंने देखा है वही जानते हैं. उन्हें देखकर लोकपाल भी सिहा गए. अवधराज दशरथजी ने सुख मानकर प्रसन्नचित्त से सब कुछ ग्रहण किया.

उन्होंने वह दहेज का सामान याचकों को, जो जिसे अच्छा लगा, दे दिया. जो बच रहा, वह जनवासे में चला आया. तब जनकजी हाथ जोड़कर सारी बारात का सम्मान करते हुए कोमल वाणी से बोले. आदर, दान, विनय और बड़ाई के द्वारा सारी बारात का सम्मान कर राजा जनक ने महान् आनंद के साथ प्रेमपूर्वक लड़ाकर (लाड़ करके) मुनियों के समूह की पूजा एवं वन्दना की. सिर नवाकर, देवताओं को मनाकर, राजा हाथ जोड़कर सबसे कहने लगे कि देवता और साधु तो भाव ही चाहते हैं (वे प्रेम से ही प्रसन्न हो जाते हैं, उन पूर्णकाम महानुभावों को कोई कुछ देकर कैसे सन्तुष्ट कर सकता है); क्या एक उंगली जल देने से कहीं समुद्र सन्तुष्ट हो सकता है. फिर जनकजी भाई सहित हाथ जोड़कर कोसलाधीश दशरथजी से स्नेह, शील और सुंदर प्रेम में सानकर मनोहर वचन बोले- हे राजन्! आपके साथ सम्बन्ध हो जाने से अब हम सब प्रकार से बड़े हो गए. इस राज-पाट सहित हम दोनों को आप बिना दाम के लिए हुए सेवक ही समझियेगा. इन लड़कियों को टहलनी मानकर, नयी-नयी दया करके पालन कीजियेगा. मैंने बड़ी ढिठाई की कि आपको यहां बुला भेजा, अपराध क्षमा कीजियेगा. फिर सूर्यकुल के भूषण दशरथजी ने समधी जनकजी को सम्पूर्ण सम्मान का निधि कर दिया.

देवतागण फूल बरसा रहे हैं; राजा जनवासे को चले. नगाड़े की ध्वनि, जयध्वनि और वेद की ध्वनि हो रही है; आकाश और नगर दोनों में खूब कौतूहल हो रहा है, तब मुनीश्वर की आज्ञा पाकर सुन्दरी सखियां मंगलगान करती हुई दुल्हनों सहित दूल्हों को लिवाकर कोहबर को चलीं. सीताजी बार-बार रामजी को देखती हैं और सकुचा जाती हैं; पर उनका मन नहीं सकुचाता. प्रेम के प्यासे उनके नेत्र सुंदर मछलियों की छवि को हर रहे हैं. श्रीरामचन्द्रजी का सांवला शरीर स्वभाव से ही सुंदर है. उसकी शोभा करोड़ों कामदेवों को लजाने वाली है. महावर से युक्त चरणकमल बड़े सुहावने लगते हैं, जिनपर मुनियों के मनरूपी भौंरे सदा छाये रहते हैं. पवित्र और मनोहर पीली धोती प्रातःकाल के सूर्य और बिजली की ज्योति को हरे लेती है. कमर में सुंदर किंकिणी और कटिसूत्र हैं. विशाल भुजाओं में सुंदर आभूषण सुशोभित हैं. पीला जनेऊ महान शोभा दे रहा है. हाथ की अंगूठी चित्त को चुरा लेती है. ब्याह के सब साज सजे हुए वे शोभा पा रहे हैं. चौड़ी छाती पर हृदय पर पहनने के सुंदर आभूषण सुशोभित हैं.

पीला दुपट्टा कांखासोती (जनेऊ की तरह) शोभित है, जिसके दोनों छोरों पर मणि और मोती लगे हैं. कमल के समान सुंदर नेत्र हैं, कानों में सुंदर कुंडल हैं और मुख तो सारी सुंदरता का खजाना ही है. सुंदर भौंहें और मनोहर नासिका है. ललाट पर तिलक तो सुंदरता का घर ही है. जिसमें मंगलमय मोती और मणि गुंथे हुए हैं, ऐसा मनोहर मौर माथे पर सोह रहा है. सुंदर मौर में बहुमूल्य मणियां गुंथी हुई हैं, सभी अंग चित्त को चुराये लेते हैं. सब नगर की स्त्रियां और देवसुन्दरियां दूल्हे को देखकर तिनका तोड़ रही हैं (उनकी बलैयां ले रही हैं) और मणि, वस्त्र तथा आभूषण निछावर करके आरती उतार रही और मंगलगान कर रही हैं. देवता फूल बरसा रहे हैं और सूत, मागध तथा भाट सुयश सुना रहे हैं. सुहागिनी स्त्रियां सुख पाकर कुंअर और कुमारियों को कोहबर (कुलदेवता के स्थान) में लायीं और अत्यन्त प्रेम से मंगलगीत गा-गाकर लौकिक रीति करने लगीं. पार्वतीजी श्रीरामचन्द्रजी को लहकौर (वर-वधू का परस्पर ग्रास देना) सिखाती हैं और सरस्वतीजी सीताजी को सिखाती हैं. रनिवास हास-विलास के आनंद में मग्न है. श्रीरामजी और सीताजी को देख-देखकर सभी जन्म का परम फल प्राप्त कर रही हैं. अपने हाथ की मणियों में सुंदर रूप के भंडार श्रीरामचन्द्रजी की परछाहीं दिख रही है. यह देखकर जानकीजी दर्शन में वियोग होने के भय से बाहुरूपी लता को और दृष्टि को हिलाती-डुलाती नहीं हैं. उस समय के हंसी-खेल और विनोद का आनंद और प्रेम कहा नहीं जा सकता, उसे सखियां ही जानती हैं. तदनन्तर वर-कन्याओं को सब सुंदर सखियां जनवासे को लिवा चलीं.

उस समय नगर और आकाश में जहां सुनिये, वहीं आशीर्वाद की ध्वनि सुनाई दे रही है और महान आनंद छाया है. सभी ने प्रसन्न मन से कहा कि सुंदर चारों जोड़ियां चिरंजीवी हों. योगिराज, सिद्ध, मुनीश्वर और देवताओं ने प्रभु श्रीरामचन्द्रजी को देखकर दुन्दुभी बजायी और हर्षित होकर फूलों की वर्षा करते हुए तथा 'जय हो, जय हो, जय हो' कहते हुए वे अपने-अपने लोक को चले. तब सब (चारों) कुमार बहुओं सहित पिताजी के पास आए. ऐसा मालूम होता था मानो शोभा, मंगल और आनंद से भरकर जनवासा उमड़ पड़ा हो. फिर बहुत प्रकार की रसोई बनी. जनकजी ने बरातियों को बुला भेजा. राजा दशरथजी ने पुत्रों सहित गमन किया. अनुपम वस्त्रों के पांवड़े पड़ते जाते हैं. आदर के साथ सबके चरण धोये और सबको यथायोग्य पीढ़ों पर बैठाया. तब जनकजी ने अवधपति दशरथजी के चरण धोये. उनका शील और स्नेह वर्णन नहीं किया जा सकता. फिर श्रीरामचन्द्रजी के चरणकमलों को धोया, जो श्रीशिवजी के हृदय-कमल में छिपे रहते हैं. तीनों भाइयों को श्रीरामचन्द्रजी के ही समान जानकर जनकजी ने उनके भी चरण अपने हाथों से धोये. राजा जनकजी ने सभी को उचित आसन दिये और सब परसने वालों को बुला लिया. आदर के साथ पत्तलें पड़ने लगीं, जो मणियों के पत्तों से सोने की कील लगाकर बनायी गई थीं.

चतुर और विनीत रसोइये सुंदर, स्वादिष्ट और पवित्र दाल-भात और गाय का सुगन्धित घी क्षणभर में सबके सामने परस गए. सब लोग पंचकौर करके (अर्थात् 'प्राणाय स्वाहा, अपानाय स्वाहा, व्यानाय स्वाहा, उदानाय स्वाहा और समानाय स्वाहा' इन मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए पहले पांच ग्रास लेकर) भोजन करने लगे. गाली का गाना सुनकर वे अत्यन्त प्रेममग्न हो गए. अनेकों तरह के अमृत के समान (स्वादिष्ट) पकवान परसे गए, जिनका बखान नहीं हो सकता. चतुर रसोइये नाना प्रकार के व्यंजन परसने लगे, उनका नाम कौन जानता है. चार प्रकार के (चर्व्य, चोष्य, लेह्य, पेय अर्थात् चबाकर, चूसकर, चाटकर और पीकर खाने योग्य) भोजन की विधि कही गई है, उनमें से एक-एक विधि के इतने पदार्थ बने थे कि जिनका वर्णन नहीं किया जा सकता. छहों रसों के बहुत तरह के सुंदर (स्वादिष्ट) व्यंजन हैं. एक-एक रस के अनगिनती प्रकार के बने हैं. भोजन करते समय पुरुष और स्त्रियों के नाम ले-लेकर स्त्रियां मधुर ध्वनि से गाली दे रही हैं (गाली गा रही हैं). समय की सुहावनी गाली शोभित हो रही है. उसे सुनकर समाजसहित राजा दशरथजी हंस रहे हैं. इस रीति से सभी ने भोजन किया और तब सबको आदरसहित आचमन (हाथ-मुंह धोनेके लिए जल) दिया गया. फिर पान देकर जनकजी ने समाजसहित दशरथजी का पूजन किया. सब राजाओं के सिरमौर (चक्रवर्ती) श्रीदशरथजी प्रसन्न होकर जनवासे को चले.

जनकपुर में नित्य नए मंगल हो रहे हैं. दिन और रात पल के समान बीत जाते हैं. बड़े सबेरे राजाओं के मुकुटमणि दशरथजी जागे. याचक उनके गुणसमूह का गान करने लगे. चारों कुमारों को सुंदर वधुओं सहित देखकर उनके मन में जितना आनंद है, वह किस प्रकार कहा जा सकता है? वे प्रातःक्रिया करके गुरु वसिष्ठजी के पास गए. उनके मन में महान आनन्द और प्रेम भरा है. राजा प्रणाम और पूजन करके, फिर हाथ जोड़कर मानो अमृत में डुबोयी हुई वाणी बोले- हे मुनिराज! सुनिये, आपकी कृपा से आज मेरा पूर्णकाम हो गया. हे स्वामिन्! अब सब ब्राह्मणों को बुलाकर उनको सब तरह गहनों-कपड़ों से सजी हुई गायें दीजिए. यह सुनकर गुरुजी ने राजा की बड़ाई करके फिर मुनिगणों को बुलवा भेजा. तब वामदेव, देवर्षि नारद, वाल्मीकि, जाबालि और विश्वामित्र आदि तपस्वी श्रेष्ठ मुनियों के समूह-के-समूह आए. राजा ने सबको दंडवत प्रणाम किया और प्रेम सहित पूजन करके उन्हें उत्तम आसन दिए. चार लाख उत्तम गायें मंगवाईं, जो कामधेनु के समान अच्छे स्वभाववाली और सुहावनी थीं. उन सबको सब प्रकार से गहनों-कपड़ों से सजाकर राजा ने प्रसन्न होकर भूदेव ब्राह्मणों को दिया. राजा बहुत तरह से विनती कर रहे हैं कि जगत् में मैंने आज ही जीने का लाभ पाया. ब्राह्मणों से आशीर्वाद पाकर राजा आनन्दित हुए. फिर याचकों के समूहों को बुलवा लिया और सबको उनकी रुचि पूछकर सोना, वस्त्र, मणि, घोड़ा, हाथी और रथ जिसने जो चाहा सो सूर्यकुल को आनन्दित करने वाले दशरथजी ने दिए.

वे सब गुणानुवाद गाते और 'सूर्यकुल के स्वामी की जय हो, जय हो, जय हो' कहते हुए चले. इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी के विवाह का उत्सव हुआ. जिन्हें सहस्र मुख हैं वे शेषजी भी उसका वर्णन नहीं कर सकते. बार-बार विश्वामित्रजी के चरणों में सिर नवाकर राजा कहते हैं- हे मुनिराज! यह सब सुख आपके ही कृपाकटाक्ष का प्रसाद है. राजा दशरथजी जनकजी के स्नेह, शील, करनी और ऐश्वर्य की सब प्रकार से सराहना करते हैं.

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