रामचरित मानस खंड-6: जब अयोध्या में श्रीराम की दुल्हन बनकर पहुंचीं सीताजी

                                          

श्रीराम और सीताजी का विवाह संपन्न हो चुका था. प्रतिदिन सबेरे उठकर अयोध्या नरेश विदा मांगते हैं. पर जनकजी उन्हें प्रेम से रख लेते हैं. आदर नित्य नया बढ़ता जाता है. प्रतिदिन हजारों प्रकार से मेहमानी होती है. नगर में नित्य नया आनन्द और उत्साह रहता है, दशरथजी का जाना किसी को नहीं सुहाता. इस प्रकार बहुत दिन बीत गए, मानो बाराती स्नेह की रस्सी से बंध गए हैं. तब विश्वामित्रजी और शतानन्दजी ने जाकर राजा जनक को समझाकर कहा- यद्यपि आप स्नेहवश उन्हें नहीं छोड़ सकते, तो भी अब दशरथजी को आज्ञा दीजिए. 'हे नाथ! बहुत अच्छा’ कहकर जनकजी ने मन्त्रियों को बुलवाया. वे आए और 'जय जीव' कहकर उन्होंने मस्तक नवाया. जनकजी ने कहा- अयोध्यानाथ चलना चाहते हैं, भीतर रनिवास में खबर कर दो. यह सुनकर मन्त्री, ब्राह्मण, सभासद और राजा जनक भी प्रेम के वश हो गए.

जनकपुरवासियों ने सुना कि बारात जाएगी, तब वे व्याकुल होकर एक-दूसरे से बात पूछने लगे. जाना सत्य है, यह सुनकर सब ऐसे उदास हो गए मानो सन्ध्या के समय कमल सकुचा गए हों. आते समय जहां-जहां बाराती ठहरे थे, वहां-वहां बहुत प्रकार का सीधा (रसोई का सामान) भेजा गया. अनेकों प्रकार के मेवे, पकवान और भोजन की सामग्री जो बखानी नहीं जा सकती. अनगिनत बैलों और कहारों पर भर-भरकर (लाद-लादकर) भेजी गई. साथ ही जनकजी ने अनेकों सुंदर शैयाएं (पलंग) भेजीं. एक लाख घोड़े और पच्चीस हजार रथ सब नख से शिखा तक (ऊपर से नीचे तक) सजाये हुए, दस हजार सजे हुए मतवाले हाथी, जिन्हें देखकर दिशाओं के हाथी भी लजा जाते हैं, गाड़ियों में भर-भरकर सोना, वस्त्र और रत्न जवाहरात और भैंस, गाय तथा और भी नाना प्रकार की चीजें दीं. इस प्रकार जनकजी ने फिर से अपरिमित दहेज दिया, जो कहा नहीं जा सकता और जिसे देखकर लोकपालों के लोकों की सम्पदा भी थोड़ी जान पड़ती थी. इस प्रकार सब सामान सजाकर राजा जनक ने अयोध्यापुरी को भेज दिया. बारात चलेगी, यह सुनते ही सब रानियां ऐसी विकल हो गईं, मानो थोड़े जल में मछलियां छटपटा रही हों. वे बार-बार सीताजी को गोद कर लेती हैं और आशीर्वाद देकर सिखावन देती हैं- तुम सदा अपने पति की प्यारी होओ, तुम्हारा सोहाग अचल हो; हमारी यही आशीष है.

सास, ससुर और गुरु की सेवा करना. पति का रुख देखकर उनकी आज्ञा का पालन करना. सयानी सखियां अत्यन्त स्नेह के वश कोमल वाणी से स्त्रियों के धर्म सिखलाती हैं. आदर के साथ सब पुत्रियों को स्त्रियों के धर्म समझाकर रानियों ने बार-बार उन्हें हृदय से लगाया. माताएं फिर-फिर भेंटती और कहती हैं कि ब्रह्मा ने स्त्रीजाति को क्यों रचा. उसी समय सूर्यवंश के पताका स्वरूप श्रीरामचन्द्रजी भाइयों सहित प्रसन्न होकर विदा कराने के लिए जनकजी के महल को चले. स्वभाव से ही सुंदर चारों भाइयों को देखने के लिए नगर के स्त्री-पुरुष दौड़े. कोई कहता है आज ये जाना चाहते हैं. विदेह ने विदाई का सब सामान तैयार कर लिया है. राजा के चारों पुत्र, इन प्यारे मेहमानों के मनोहर रूप को नेत्र भरकर देख लो. हे सयानी! कौन जाने, किस पुण्य से विधाता ने इन्हें यहां लाकर हमारे नेत्रों का अतिथि किया है. मरने वाला जिस तरह अमृत पा जाय, जन्म का भूखा कल्पवृक्ष पा जाय और नरक में रहने वाला (या नरक के योग्य) जीव जैसे भगवान के परमपद को प्राप्त हो जाय, हमारे लिए इनके दर्शन वैसे ही हैं. श्रीरामचन्द्रजी की शोभा को निरखकर हृदय में धर लो. अपने मन को सांप और इनकी मूर्ति को मणि बना लो. इस प्रकार सबको नेत्रों का फल देते हुए सब राजकुमार राजमहल में गए.


रूप के समुद्र सब भाइयों को देखकर सारा रनिवास हर्षित हो उठा. सासें महान प्रसन्न मन से निछावर और आरती करती हैं. श्रीरामचन्द्रजी की छवि देखकर वे प्रेम में अत्यन्त मग्न हो गईं और प्रेम के विशेष वश होकर बार-बार चरणों लगीं. हृदय में प्रीति छा गई, इससे लज्जा नहीं रह गई. उनके स्वाभाविक स्नेह का वर्णन किस तरह किया जा सकता है. उन्होंने भाइयों सहित श्रीरामजी को उबटन करके स्नान कराया और बड़े प्रेम से षट्रस भोजन कराया. सुअवसर जानकर श्रीरामचन्द्रजी शील, स्नेह और संकोचभरी वाणी बोले- महाराज अयोध्यापुरी को चलना चाहते हैं, उन्होंने हमें विदा होने के लिए यहां भेजा है. हे माता! प्रसन्न मन से आज्ञा दीजिए और हमें अपने बालक जानकर सदा स्नेह बनाए रखिएगा. इन वचनों को सुनते ही रनिवास उदास हो गया. सासें प्रेमवश बोल नहीं सकतीं. उन्होंने सब कुमारियों को हृदय से लगा लिया और उनके पतियों को सौंपकर बहुत विनती की. विनती करके उन्होंने सीताजी को श्रीरामचन्द्रजी को समर्पित किया और हाथ जोड़कर बार-बार कहा- हे तात! हे सुजान! मैं बलि जाती हूं, तुमको सबकी गति (हाल) मालूम है. परिवार को, पुरवासियों को, मुझको और राजा को सीता प्राणों के समान प्रिय है, ऐसा जानिएगा.

तुम पूर्णकाम हो, सुजानशिरोमणि हो और भावप्रिय हो. हे राम! तुम भक्तों के गुणों को ग्रहण करने वाले, दोषों को नाश करने वाले और दया के धाम हो. ऐसा कहकर रानी चरणों को पकड़कर चुप रह गईं. मानो उनकी वाणी प्रेमरूपी दलदल में समा गई हो. स्नेह से सनी हुई श्रेष्ठ वाणी सुनकर श्रीरामचन्द्रजी ने सास का बहुत प्रकार से सम्मान किया तब श्रीरामचन्द्रजी ने हाथ जोड़कर विदा मांगते हुए बार-बार प्रणाम किया. आशीर्वाद पाकर और फिर सिर नवाकर भाइयों सहित श्रीरघुनाथजी चले. श्रीरामजी की सुन्दर मधुर मूर्ति को हृदय में लाकर सब रानियां स्नेह से शिथिल हो गईं. फिर धीरज धारण करके कुमारियों को बुलाकर माताएं बारंबार उन्हें गले लगाकर भेंटने लगीं. पुत्रियों को पहुंचाती हैं, फिर लौटकर मिलती हैं. परस्पर में कुछ थोड़ी प्रीति नहीं बढ़ी (अर्थात बहुत प्रीति बढ़ी). बार-बार मिलती हुई माताओं को सखियों ने अलग कर दिया. जैसे हाल की ब्याही हुई गाय को कोई उसके बालक बछड़े से अलग कर दे. सब स्त्री-पुरुष और सखियों सहित सारा रनिवास प्रेम के विशेष वश हो रहा है. ऐसा लगता है मानो जनकपुर में करुणा और विरह ने डेरा डाल दिया है. जानकी ने जिन तोता और मैना को पाल-पोसकर बड़ा किया था और सोने के पिंजड़ों में रखकर पढ़ाया था, वे व्याकुल होकर कह रहे हैं- वैदेही कहां हैं. उनके ऐसे वचनों को सुनकर धीरज किसको नहीं त्याग देगा अर्थात् सबका धैर्य जाता रहा. जब पक्षी और पशु तक इस तरह विकल हो गए, तब मनुष्यों की दशा कैसे कही जा सकती है. तब भाई सहित जनकजी वहां आये. प्रेम से उमड़कर उनके नेत्रों में प्रेमाश्रुओं का जल भर आया.

वे परम वैराग्यवान कहलाते थे; पर सीताजी को देखकर उनका भी धीरज भाग गया. राजा ने जानकीजी को हृदय से लगा लिया. प्रेम के प्रभाव से ज्ञान की महान मर्यादा मिट गई (ज्ञान का बांध टूट गया). सब बुद्धिमान् मन्त्री उन्हें समझाते हैं. तब राजा ने विषाद करने का समय न जानकर विचार किया. बारंबार पुत्रियों को हृदय से लगाकर सुन्दर सजी हुई पालकियां मंगवाईं. सारा परिवार प्रेम में विवश है. राजा ने सुंदर मुहूर्त जानकर सिद्धिसहित गणेशजी का स्मरण करके कन्याओं को पालकियों पर चढ़ाया. राजा ने पुत्रियों को बहुत प्रकार से समझाया और उन्हें स्त्रियों का धर्म और कुल की रीति सिखाई. बहुत-से दासी-दास दिए, जो सीताजी के प्रिय और विश्वासपात्र सेवक थे. सीताजी के चलते समय जनकपुरवासी व्याकुल हो गए. मंगल की राशि शुभ शकुन हो रहे हैं. ब्राह्मण और मन्त्रियों के समाजसहित राजा जनकजी उन्हें पहुंचाने के लिए साथ चले. समय देखकर बाजे बजने लगे. बरातियों ने रथ, हाथी और घोड़े सजाये. दशरथजी ने सब ब्राह्मणों को बुला लिया और उन्हें दान और सम्मान से परिपूर्ण कर दिया. उनके चरणकमलों की धूलि सिर पर धरकर और आशीष पाकर राजा आनन्दित हुए और गणेशजी का स्मरण करके उन्होंने प्रस्थान किया.

देवता हर्षित होकर फूल बरसा रहे हैं और अप्सराएं गान कर रही हैं. अवधपति दशरथजी नगाड़े बजाकर आनंदपूर्वक अयोध्यापुरी को चले. राजा दशरथजी ने विनती करके प्रतिष्ठित जनों को लौटाया और आदर के साथ सब मंगनों को बुलवाया. उनको गहने-कपड़े, घोड़े-हाथी दिए और प्रेम से पुष्ट करके सबको संपन्न अर्थात बलयुक्त कर दिया. वे सब बारंबार विरुदावली (कुलकीर्ति) बखानकर और श्रीरामचन्द्रजी को हृदय में रखकर लौटे. कोसलाधीश दशरथजी बार-बार लौटने को कहते हैं, परन्तु जनकजी प्रेमवश लौटना नहीं चाहते. दशरथजी ने फिर सुहावने वचन कहे- हे राजन्! बहुत दूर आ गए, अब लौटिये. फिर राजा दशरथजी रथ से उतरकर खड़े हो गए. उनके नेत्रों में प्रेम का प्रवाह बढ़ आया. तब जनकजी हाथ जोड़कर मानो स्नेहरूपी अमृत में डुबोकर वचन बोले- मैं किस तरह बनाकर (किन शब्दों में) विनती करूं. हे महाराज! आपने मुझे बड़ी बड़ाई दी है. अयोध्यानाथ दशरथजी ने अपने स्वजन समधी का सब प्रकार से सम्मान किया. उनके आपस के मिलने में अत्यन्त विनय थी और इतनी प्रीति थी जो हृदय में समाती न थी. जनकजी ने मुनिमंडली को सिर नवाया और सभी से आशीर्वाद पाया.

फिर आदर के साथ वे रूप, शील और गुणों के निधान सब भाइयों से अपने दामादों से मिले. और सुन्दर कमल के समान हाथों को जोड़कर ऐसे वचन बोले जो मानो प्रेम से ही जन्मे हों. हे रामजी! मैं किस प्रकार आपकी प्रशंसा करूं! आप मुनियों और महादेवजी के मनरूपी मानसरोवर के हंस हैं. योगी लोग जिनके लिए क्रोध, मोह, ममता और मद को त्यागकर योगसाधन करते हैं, जो सर्वव्यापक, ब्रह्म, अव्यक्त, अविनाशी, चिदानंद, निर्गुण और गुणों की राशि हैं, जिनको मनसहित वाणी नहीं जानती और सब जिनका अनुमान ही करते हैं, कोई तर्कना नहीं कर सकते; जिनकी महिमा को वेद 'नेति' कहकर वर्णन करता है और जो सच्चिदानन्द तीनों कालों में एकरस (सर्वदा और सर्वथा निर्विकार) रहते हैं; वे ही समस्त सुखों के मूल आप मेरे नेत्रों के विषय हुए. ईश्वर के अनुकूल होने पर जगत में जीव को सब लाभ-ही-लाभ है. आपने मुझे सभी प्रकार से बड़ाई दी और अपना जन जानकर अपना लिया. यदि दस हजार सरस्वती और शेष हों और करोड़ों कल्पों तक गणना करते रहें. हे रघुनाथजी! सुनिये, मेरे सौभाग्य और आपके गुणों की कथा कहकर समाप्त नहीं की जा सकती. मैं जो कुछ कह रहा हूं, वह अपने इस एक ही बलपर कि आप अत्यन्त थोड़े प्रेम से प्रसन्न हो जाते हैं. मैं बार-बार हाथ जोड़कर यह मांगता हूं कि मेरा मन भूलकर भी आपके चरणों को न छोड़े. जनकजी के श्रेष्ठ वचनों को सुनकर, जो मानो प्रेम से पुष्ट किए हुए थे, पूर्ण काम श्रीरामचन्द्रजी सन्तुष्ट हुए.

उन्होंने सुन्दर विनती करके पिता दशरथजी, गुरु विश्वामित्रजी और कुलगुरु वसिष्ठजी के समान जानकर ससुर जनकजी का सम्मान किया. फिर जनकजी ने भरतजी से विनती की और प्रेम के साथ मिलकर फिर उन्हें आशीर्वाद दिया. फिर राजा ने लक्ष्मणजी और शत्रुघ्नजी से मिलकर उन्हें आशीर्वाद दिया. वे परस्पर प्रेम के वश होकर बार-बार आपस में सिर नवाने लगे. जनकजी की बार-बार विनती और बड़ाई करके श्रीरघुनाथजी सब भाइयों के साथ चले. जनकजी ने जाकर विश्वामित्रजी के चरण पकड़ लिए और उनके चरणों की रज को सिर और नेत्रों में लगाया. उन्होंने कहा- हे मुनीश्वर! सुनिये, आपके सुन्दर दर्शन से कुछ भी दुर्लभ नहीं है, मेरे मन में ऐसा विश्वास है. जो सुख और सुयश लोकपाल चाहते हैं; परन्तु जिसका मनोरथ करते हुए सकुचाते हैं. हे स्वामी! वही सुख और सुयश मुझे सुलभ हो गया; सारी सिद्धियां आपके दर्शनों की अनुगामिनी अर्थात् पीछे-पीछे चलने वाली हैं. इस प्रकार बार-बार विनती की और सिर नवाकर तथा उनसे आशीर्वाद पाकर राजा जनक लौटे. डंका बजाकर बारात चली. छोटे-बड़े सभी समुदाय प्रसन्न हैं. रास्ते के गांवों के स्त्री-पुरुष श्रीरामचन्द्रजी को देखकर नेत्रों का फल पाकर सुखी होते हैं. बीच-बीच में सुन्दर मुकाम करती हुई तथा मार्ग के लोगों को सुख देती हुई वह बारात पवित्र दिन में अयोध्यापुरी के समीप आ पहुंची.

सुन्दर ढोल बजने लगे. भेरी और शंख की बड़ी आवाज हो रही है; हाथी-घोड़े गरज रहे हैं. विशेष शब्द करने वाली झांझें, सुहावनी डफलियां तथा रसीले राग से शहनाइयां बज रही हैं. बारात को आती हुई सुनकर नगरनिवासी प्रसन्न हो गए. सबके शरीरों पर पुलकावली छा गई. सबने अपने-अपने सुन्दर घरों, बाजारों, गलियों, चौराहों और नगर के द्वारों को सजाया. सारी गलियां अरगजे से सिंचायी गईं, जहां-तहां सुन्दर चौक पुराए गए. तोरणों, ध्वजा-पताकाओं और मंडपों से बाजार ऐसा सजा कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता. फल सहित सुपारी, केला, आम, मौलसिरी, कदम्ब और तमाल के वृक्ष लगाए गए. वे लगे हुए सुन्दर वृक्ष पृथ्वी को छू रहे हैं. उनके मणियों के थाले बड़ी सुन्दर कारीगरी से बनाये गए हैं अनेक प्रकार के मंगल-कलश घर-घर सजाकर बनाये गए हैं. श्रीरघुनाथजी की पुरी (अयोध्या) को देखकर ब्रह्मा आदि सब देवता सिहाते हैं. उस समय राजमहल अत्यन्त शोभित हो रहा था. उसकी रचना देखकर कामदेव का भी मन मोहित हो जाता था. मंगल शकुन, मनोहरता, ऋद्धि-सिद्धि, सुख, सुहावनी सम्पत्ति और सब प्रकार के उत्साह मानो सहज सुन्दर शरीर धर-धरकर दशरथजी के घर में छा गए हैं. श्रीरामचन्द्रजी और सीताजी के दर्शनों के लिए भला कहिये किसे लालसा न होगी?

सुहागिनी स्त्रियां झुंड-की-झुंड मिलकर चलीं, जो अपनी छवि से कामदेव की स्त्री रतिका भी निरादर कर रही हैं. सभी सुन्दर मंगलद्रव्य एवं आरती सजाये हुए गा रही हैं, मानो सरस्वतीजी ही बहुत-से वेष धारण किये गा रही हों. राजमहल में आनन्द के मारे शोर मच रहा है. उस समय का और सुख का वर्णन नहीं किया जा सकता. कौशल्याजी आदि श्रीरामचन्द्रजी की सब माताएं प्रेम के विशेष वश होने से शरीर की सुध भूल गयीं. गणेशजी और त्रिपुरारि शिवजी का पूजन करके उन्होंने ब्राह्मणों को बहुत-सा दान दिया. वे ऐसी परम प्रसन्न हुईं, मानो अत्यन्त दरिद्री चारों पदार्थ पा गया हो. सुख और महान् आनन्द से विवश होने के कारण सब माताओं के शरीर शिथिल हो गए हैं, उनके चरण चलते नहीं हैं. श्रीरामचन्द्रजी के दर्शनों के लिए वे अत्यन्त अनुराग में भरकर परछन का सब सामान सजाने लगीं. अनेकों प्रकार के बाजे बजते थे. सुमित्राजी ने आनन्दपूर्वक मंगल साज सजाये. हल्दी, दूब, दही, पत्ते, फूल, पान और सुपारी आदि मंगल की मूल वस्तुएं, तथा अक्षत (चावल), अंखुए, गोरोचन, लावा और तुलसी की सुन्दर मंजरियां सुशोभित हैं. नाना रंगों से चित्रित किये हुए सहज सुहावने सुवर्ण के कलश ऐसे मालूम होते हैं, मानो कामदेव के पक्षियों ने घोंसले बनाये हों. शकुन की सुगन्धित वस्तुएं बखानी नहीं जा सकतीं. सब रानियां सम्पूर्ण मंगल साज सज रही हैं. बहुत प्रकार की आरती बनाकर वे आनन्दित हुईं सुन्दर मंगलगान कर रही हैं.

सोने के थालों को मांगलिक वस्तुओं से भरकर अपने कमल के समान (कोमल) हाथों में लिए हुए माताएं आनन्दित होकर परछन करने चलीं. उनके शरीर पुलकावली से छा गए हैं. धूप के धुएं से आकाश ऐसा काला हो गया है मानो सावन के बादल घुमड़-घुमड़कर छा गए हों. देवता कल्पवृक्ष के फूलों की मालाएं बरसा रहे हैं. वे ऐसी लगती हैं मानो बगुलों की पांति मन को अपनी ओर खींच रही हो. सुंदर मणियों से बने बंदनवार ऐसे मालूम होते हैं मानो इन्द्रधनुष सजाए हों. अटारियों पर सुन्दर और चपल स्त्रियां प्रकट होती और छिप जाती हैं; वे ऐसी जान पड़ती हैं मानो बिजलियां चमक रही हों. नगाड़ों की ध्वनि मानो बादलों की घोर गर्जना है. याचकगण पपीहे, मेंढक और मोर हैं. देवता पवित्र सुगन्धरूपी जल बरसा रहे हैं, जिससे खेती के समान नगर के सब स्त्री-पुरुष सुखी हो रहे हैं. प्रवेश का समय जानकर गुरु वसिष्ठजी ने आज्ञा दी. तब रघुकुलमणि महाराज दशरथजी ने शिवजी, पार्वतीजी और गणेशजी का स्मरण करके समाजसहित आनन्दित होकर नगर में प्रवेश किया. शकुन हो रहे हैं, देवता दुन्दुभी बजा बजाकर फूल बरसा रहे हैं. देवताओं की स्त्रियां आनन्दित होकर सुन्दर मंगलगीत गा-गाकर नाच रही हैं. मागध, सूत, भाट और चतुर नट तीनों लोकों के उजागर (सबको प्रकाश देने वाले, परम प्रकाशस्वरूप) श्रीरामचन्द्रजी का यश गा रहे हैं. जयध्वनि तथा वेद की निर्मल श्रेष्ठ वाणी सुन्दर मंगल से सनी हुई दसों दिशाओं में सुनाई पड़ रही है.

बहुत-से बाजे बजने लगे. आकाश में देवता और नगर में लोग सब प्रेम में मग्न हैं. बराती ऐसे बने-ठने हैं कि उनका वर्णन नहीं हो सकता. परम आनन्दित हैं, सुख उनके मन में समाता नहीं है. तब अयोध्यावासियों ने राजा को जोहार (वन्दना) की. श्रीरामचन्द्रजी को देखते ही वे सुखी हो गए. सब मणियां और वस्त्र निछावर कर रहे हैं. नेत्रों में प्रेमाश्रुओं का जल भरा है और शरीर पुलकित हैं. नगर की स्त्रियां आनन्दित होकर आरती कर रही हैं और सुन्दर चारों कुमारों को देखकर हर्षित हो रही हैं. पालकियों के सुंदर पर्दे हटा-हटाकर वे दुल्हनों को देखकर सुखी होती हैं. इस प्रकार सबको सुख देते हुए राजद्वार पर आए. माताएं आनन्दित होकर बहुओं सहित कुमारों का परछन कर रही हैं. वे बार-बार आरती कर रही हैं. उस प्रेम और महान आनन्द को कौन कह सकता है! अनेकों प्रकार के आभूषण, रत्न और वस्त्र तथा अगणित प्रकार की अन्य वस्तुएं निछावर कर रही हैं. बहुओं सहित चारों पुत्रों को देखकर माताएं परमानन्द में मग्न हो गईं. सीताजी और श्रीरामजी की छवि को बार-बार देखकर वे जगत में अपने जीवन को सफल मानकर आनन्दित हो रही हैं.

सखियां सीताजी के मुख को बार-बार देखकर अपने पुण्यों की सराहना करती हुई गान कर रही हैं. देवता क्षण-क्षण में फूल बरसाते, नाचते, गाते तथा अपनी-अपनी सेवा समर्पण करते हैं. चारों मनोहर जोड़ियों को देखकर सरस्वती ने सारी उपमाओं को खोज डाला; पर कोई उपमा देते नहीं बनी, क्योंकि उन्हें सभी बिलकुल तुच्छ जान पड़ीं. तब हारकर वे भी श्रीरामजी के रूप में अनुरक्त होकर एकटक देखती रह गईं. वेद की विधि और कुल की रीति करके अर्ध्य-पांवड़े देती हुई बहुओं समेत सब पुत्रों को परछन करके माताएं महल में लिवा चलीं. स्वाभाविक ही सुन्दर चार सिंहासन थे, जो मानो कामदेव ने ही अपने हाथ से बनाए थे. उनपर माताओं ने राजकुमारियों और राजकुमारों को बैठाया और आदर के साथ उनके पवित्र चरण धोए गए.

फिर वेद की विधि अनुसार मंगलों के निधान दूल्हों और दुल्हनों की धूप, दीप और नैवेद्य आदि के द्वारा पूजा की. माताएं बारंबार आरती कर रही हैं और वर-वधुओं के सिरों पर सुन्दर पंखे तथा चंवर ढल रहे हैं. अनेकों वस्तुएं निछावर हो रही हैं; सभी माताएं आनन्द से भरी हुई ऐसी सुशोभित हो रही हैं मानो योगी ने परम तत्त्व को प्राप्त कर लिया. सदा के रोगी ने मानो अमृत पा लिया, जन्म का दरिद्री मानो पारस पा गया. अंधे को सुन्दर नेत्रों का लाभ हुआ. गूंगे के मुख में मानो सरस्वती आ विराजीं और शूरवीर ने मानो युद्ध में विजय पा ली. इन सुखों से भी सौ करोड़ गुना बढ़कर आनंद माताएं पा रही हैं. क्योंकि रघुकुल के चन्द्रमा श्रीरामजी विवाह करके भाइयों सहित घर आए हैं.

माताएं लोकरीति करती हैं और दूल्हा-दुल्हन सकुचाते हैं. इस महान आनन्द और विनोद को देखकर श्रीरामचन्द्रजी मन-ही-मन मुस्कुरा रहे हैं. मन की सभी वासनाएं पूरी हुई जानकर देवता और पितरों का भलीभांति पूजन किया. सबकी वन्दना करके माताएं यही वरदान मांगती हैं कि भाइयों सहित श्रीरामजी का कल्याण हो. देवता अंतरिक्ष से आशीर्वाद दे रहे हैं और माताएं आनन्दित हो आंचल भरकर ले रही हैं. तदंतर राजा ने बारातियों को बुलवा लिया और उन्हें सवारियां, वस्त्र, मणि (रत्न) और आभूषणादि दिए. आज्ञा पाकर, श्रीरामजी को हृदय में रखकर वे सब आनन्दित होकर अपने-अपने घर गए. नगर के समस्त स्त्री-पुरुषों को राजा ने कपड़े और गहने पहनाए. घर-घर बधावे बजने लगे. याचक लोग जो-जो मांगते हैं, विशेष प्रसन्न होकर राजा उन्हें वही वही देते हैं. सम्पूर्ण सेवकों और बाजे वालों को राजा ने नाना प्रकार के दान और सम्मान से सन्तुष्ट किया. सब जोहार (वन्दन) करके आशीष देते हैं और गुणसमूहों की कथा गाते हैं. तब गुरु और ब्राह्मणों सहित राजा दशरथजी ने महल में गमन किया.

वसिष्ठजी ने जो आज्ञा दी, उसे लोक और वेद की विधि के अनुसार राजा ने आदरपूर्वक किया. ब्राह्मणों की भीड़ देखकर अपना बड़ा भाग्य जानकर सब रानियां आदर के साथ उठीं. चरण धोकर उन्होंने सबको स्नान कराया और राजा ने भलीभांति पूजन करके उन्हें भोजन कराया. आदर, दान और प्रेम से पुष्ट हुए वे सन्तुष्ट मन से आशीर्वाद देते हुए चले. राजा ने गाधि-पुत्र विश्वामित्रजी की बहुत तरह से पूजा की और कहा- हे नाथ! मेरे समान धन्य दूसरा कोई नहीं है. राजा ने उनकी बहुत प्रशंसा की और रानियों सहित उनकी चरणधूलि को ग्रहण किया. उन्हें महल के भीतर ठहरने को उत्तम स्थान दिया, जिसमें राजा और सब रनिवास उनका मन जोहता रहे (अर्थात् जिसमें राजा और महल की सारी रानियां स्वयं उनके इच्छानुसार उनके आराम की ओर दृष्टि रख सकें), फिर राजा ने गुरु वसिष्ठजी के चरणकमलों की पूजा और विनती की. उनके हृदय में कम प्रीति न थी. बहुओं सहित सब राजकुमार और सब रानियों समेत राजा बार-बार गुरुजीके चरणों की वन्दना करते हैं और मुनीश्वर आशीर्वाद देते हैं. राजा ने अत्यन्त प्रेमपूर्ण हृदय से पुत्रों को और सारी सम्पत्ति को सामने रखकर (उन्हें स्वीकार करने के लिये) विनती की. परन्तु मुनिराज ने (पुरोहित के नाते) केवल अपना नेग मांग लिया और बहुत तरह से आशीर्वाद दिया. फिर सीताजी सहित श्रीरामचन्द्रजी को हृदय में रखकर गुरु वसिष्ठजी हर्षित होकर अपने स्थान को गए. राजा ने सब ब्राह्मणों की स्त्रियों को बुलवाया और उन्हें सुन्दर वस्त्र तथा आभूषण पहनाये. फिर सब सुआसिनियों को (नगरभर की सौभाग्यवती बहिन, बेटी, भानजी आदि को) बुलवा लिया और उनकी रुचि समझकर (उसी के अनुसार) उन्हें पहिरावनी दी. नेगी लोग सब अपना-अपना नेग-जोग लेते और राजाओं के शिरोमणि दशरथजी उनकी इच्छा के अनुसार देते हैं.

जिन मेहमानों को प्रिय और पूजनीय जाना, उनका राजा ने भलीभांति सम्मान किया. देवगण श्रीरघुनाथजी का विवाह देखकर, उत्सव की प्रशंसा करके फूल बरसाते हुए- नगाड़े बजाकर और परम सुख प्राप्त कर अपने-अपने लोकों को चले. वे एक-दूसरे से श्रीरामजी का यश कहते जाते हैं. हृदय में प्रेम समाता नहीं है. सब प्रकार से सबका प्रेमपूर्वक भलीभांति आदर-सत्कार कर लेने पर राजा दशरथजी के हृदय में पूर्ण उत्साह भर गया. जहां रनिवास था, वे वहां पधारे और बहुओं समेत उन्होंने कुमारों को देखा. राजा ने आनन्द सहित पुत्रों को गोद में ले लिया. उस समय राजा को जितना सुख हुआ उसे कौन कह सकता है? फिर पुत्रवधुओं को प्रेम सहित गोदी में बैठाकर, बार-बार हृदय में हर्षित होकर उन्होंने उनका दुलार (लाड़-चाव) किया. यह समाज (समारोह) देखकर रनिवास प्रसन्न हो गया. सबके हृदय में आनन्द ने निवास कर लिया. तब राजा ने जिस तरह विवाह हुआ था वह सब कहा. उसे सुन-सुनकर सब किसी को हर्ष होता है. राजा जनक के गुण, शील, महत्त्व, प्रीति की रीति और सुहावनी सम्पत्ति का वर्णन राजा ने भाट की तरह बहुत प्रकार से किया. जनकजी की करनी सुनकर सब रानियां बहुत प्रसन्न हुईं.

पुत्रों सहित स्नान करके राजा ने ब्राह्मण, गुरु और कुटुम्बियों को बुलाकर अनेक प्रकार के भोजन किए. यह सब करते-करते पांच घड़ी रात बीत गई. सुन्दर स्त्रियां मंगलगान कर रही हैं. वह रात्रि सुख की मूल और मनोहारिणी हो गई. सबने आचमन करके पान खाए और फूलों की माला, सुगन्धित द्रव्य आदि से विभूषित होकर सब शोभा से छा गए. श्रीरामचन्द्रजी को देखकर और आज्ञा पाकर सब सिर नवाकर अपने-अपने घर को चले. वहां के प्रेम, आनन्द, विनोद, महत्त्व, समय, समाज और मनोहरता को सैकड़ों सरस्वती, शेष, वेद, ब्रह्मा, महादेवजी और गणेशजी भी नहीं कह सकते. राजा ने सबका सब प्रकार से सम्मान करके, कोमल वचन कहकर रानियों को बुलाया और कहा—बहुएं अभी बच्ची हैं, पराये घर आयी हैं. इनको इस तरह से रखना जैसे नेत्रों को पलकें रखती हैं. लड़के थके हुए नींद के वश हो रहे हैं, इन्हें ले जाकर शयन कराओ. ऐसा कहकर राजा श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में मन लगाकर विश्राम भवन में चले गए. राजा के स्वभाव से ही सुन्दर वचन सुनकर रानियों ने मणियों से जड़े सुवर्ण के पलंग बिछवाये. गद्दों पर गौ के दूध के फेन के समान सुन्दर एवं कोमल अनेकों सफेद चादरें बिछाईं. सुन्दर तकियों का वर्णन नहीं किया जा सकता. मणियों के मन्दिर में फूलों की मालाएं और सुगन्ध द्रव्य सजे हैं. सुन्दर रत्नों के दीपकों और सुन्दर चंदोवे की शोभा कहते नहीं बनती. जिसने उन्हें देखा हो, वही जान सकता है.

इस प्रकार सुंदर शैया सजाकर माताओं ने श्रीरामचन्द्रजी को उठाया और प्रेमसहित पलंग पर पौढ़ाया. श्रीरामजी ने बार-बार भाइयों को आज्ञा दी. तब वे भी अपनी-अपनी शैयाओं पर सो गए. श्रीरामजी के सांवले सुन्दर कोमल अंगों को देखकर सब माताएं प्रेमसहित वचन कह रही हैं- हे तात! मार्ग में जाते हुए तुमने बड़ी भयावनी ताड़का राक्षसी को किस प्रकार से मारा? बड़े भयानक राक्षस, जो विकट योद्धा थे और जो युद्ध में किसी को कुछ नहीं गिनते थे, उन दुष्ट मारीच और सुबाहु को सहायकों सहित तुमने कैसे मारा? हे तात! मैं बलैया लेती हूं, मुनि की कृपा से ही ईश्वर ने तुम्हारी बहुत-सी बलाओं को टाल दिया. दोनों भाइयों ने यज्ञ की रखवाली करके गुरुजी के प्रसाद से सब विद्याएं पाईं. चरणों की धूलि लगते ही मुनिपत्नी अहल्या तर गई. विश्वभर में यह कीर्ति पूर्णरीति से व्याप्त हो गई. कच्छप की पीठ, वज्र और पर्वत से भी कठोर शिवजी के धनुष को राजाओं के समाज में तुमने तोड़ दिया. विश्वविजय के यश और जानकी को पाया और सब भाइयों को ब्याहकर घर आए. तुम्हारे सभी कर्म अमानुषी हैं (मनुष्य की शक्ति के बाहर हैं), जिन्हें केवल विश्वामित्रजी की कृपा ने सुधारा है (सम्पन्न किया है).

हे तात! तुम्हारा चन्द्रमुख देखकर आज हमारा जगत में जन्म लेना सफल हुआ. तुमको बिना देखे जो दिन बीते हैं, उनको ब्रह्मा गिनती में न लावें. विनय भरे उत्तम वचन कहकर श्रीरामचन्द्रजी ने सब माताओं को संतुष्ट किया. फिर शिवजी, गुरु और ब्राह्मणों के चरणों का स्मरण कर नेत्रों को नींद के वश किया. नींद में भी उनका अत्यन्त सलोना मुखड़ा ऐसा सोह रहा था, मानो सन्ध्या के समय का लाल कमल सोह रहा हो. स्त्रियां घर-घर जागरण कर रही हैं और आपस में (एक-दूसरी को) मंगलमयी गालियां दे रही हैं. रानियां कहती हैं- हे सजनी! देखो, आज रात्रि की कैसी शोभा है, जिससे अयोध्यापुरी विशेष शोभित हो रही है! यों कहती हुई सासें सुन्दर बहुओं को लेकर सो गईं, मानो सर्पों ने अपने सिर की मणियों को हृदय में छिपा लिया है. प्रातःकाल पवित्र ब्रह्ममुहूर्त में प्रभु जागे. मुर्गे सुन्दर बोलने लगे. भाट और मागधों ने गुणों का गान किया तथा नगर के लोग द्वार पर जोहार करने को आए. ब्राह्मणों, देवताओं, गुरु, पिता और माताओं की वन्दना करके आशीर्वाद पाकर सब भाई प्रसन्न हुए. माताओं ने आदर के साथ उनके मुखों को देखा. फिर वे राजा के साथ दरवाजे पधारे. स्वभाव से ही पवित्र चारों भाइयों ने पवित्र सरयू नदी में स्नान किया और प्रातः क्रिया (सन्ध्या-वन्दनादि) करके वे पिता के पास आए.

राजा ने देखते ही उन्हें हृदय से लगा लिया. तदनन्तर वे आज्ञा पाकर हर्षित होकर बैठ गए. श्रीरामचन्द्रजी के दर्शनकर और नेत्रों के लाभ की बस यही सीमा है, ऐसा अनुमानकर सारी सभा शीतल हो गई. फिर मुनि वसिष्ठजी और विश्वामित्रजी आए.राजा ने उनको सुन्दर आसनों पर बैठाया और पुत्रों-समेत उनकी पूजा करके उनके चरणों लगे. दोनों गुरु श्रीरामजी को देखकर प्रेम में मुग्ध हो गए. वसिष्ठजी धर्म के इतिहास कह रहे हैं और राजा रनिवास सहित सुन रहे हैं. जो मुनियों के मन को भी अगम्य है, ऐसी विश्वामित्रजी की करनी को वसिष्ठजी ने आनन्दित होकर बहुत प्रकार से वर्णन किया. वामदेवजी बोले- ये सब बातें सत्य हैं. विश्वामित्रजी की सुन्दर कीर्ति तीनों लोकों में छाई हुई है. यह सुनकर सब किसी को आनन्द हुआ. श्रीराम-लक्ष्मण के हृदय में अधिक उत्साह हुआ. नित्य ही मंगल, आनन्द और उत्सव होते हैं. इस तरह आनन्द में दिन बीतते जाते हैं. अयोध्या आनन्द से भरकर उमड़ पड़ी, आनन्द की अधिकता अधिक-अधिक बढ़ती ही जा रही है. अच्छा दिन शोधकर सुन्दर कंकड़ खोले गए.मंगल, आनन्द और विनोद कुछ कम नहीं हुए. इस प्रकार नित्य नये सुख को देखकर देवता सिहाते हैं और अयोध्या में जन्म पाने के लिए ब्रह्माजी से याचना करते हैं.

विश्वामित्रजी अपने आश्रम जाना चाहते हैं, पर रामचन्द्रजी के स्नेह और विनयवश रह जाते हैं. दिनो-दिन राजा का सौगुना भाव (प्रेम) देखकर महामुनिराज विश्वामित्रजी उनकी सराहना करते हैं. अन्त में जब विश्वामित्रजी ने विदा मांगी, तब राजा प्रेममग्न हो गए और पुत्रों सहित आगे खड़े हो गए. वे बोले- हे नाथ! यह सारी सम्पदा आपकी है. मैं तो स्त्री-पुत्रों सहित आपका सेवक हूं. हे मुनि! लड़कों पर सदा स्नेह करते रहिएगा और मुझे भी दर्शन देते रहिएगा. ऐसा कहकर पुत्रों और रानियों सहित राजा दशरथजी विश्वामित्रजी के चरणों पर गिर पड़े, उनके मुंह से बात नहीं निकलती. ब्राह्मण विश्वामित्रजी ने बहुत प्रकार से आशीर्वाद दिए और वे चल पड़े, प्रीति की रीति कही नहीं जाती. सब भाइयों को साथ लेकर श्रीरामजी प्रेम के साथ उन्हें पहुंचाकर और आज्ञा पाकर लौटे. गाधिकुल के चन्द्रमा विश्वामित्रजी बड़े हर्ष के साथ श्रीरामचन्द्रजी के रूप, राजा दशरथजी की भक्ति, चारों भाइयों के विवाह और सबके उत्साह और आनन्द को मन-ही-मन सराहते जाते हैं. वामदेवजी और रघुकुल के गुरु ज्ञानी वसिष्ठजी ने फिर विश्वामित्रजी की कथा बखानकर कही. मुनिका सुन्दर यश सुनकर राजा मन-ही-मन अपने पुण्यों के प्रभाव का बखान करने लगे. आज्ञा हुई तब सब लोग अपने-अपने घरों को लौटे. राजा दशरथजी भी पुत्रों सहित महल में गए. जहां-तहां सब श्रीरामचन्द्रजी के विवाह की गाथाएं गा रहे हैं. श्रीरामचन्द्रजी का पवित्र सुयश तीनों लोकों में छा गया. जब से श्रीरामचन्द्रजी विवाह करके घर आए, तबसे सब प्रकार का आनन्द अयोध्या में आकर बसने लगा. प्रभु के विवाह में जैसा आनन्द हुआ, उसे सरस्वती और सर्पों के राजा शेषजी भी नहीं कह सकते.

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